अलंकार – अलंकार की परिभाषा, भेद, उदाहरण, स्पष्टीकरण अत्यन्त आसान एवं सरल शब्दों में—

हिन्दी काव्य साहित्य जगत् में संकलित सम्पूर्ण अलंकारों (Ornamentation) का परिचय अत्यन्त आसान एवं सरल शब्दों में—

विषय-सूची

हिन्दी काव्य साहित्य में अलंकार अथवा काव्य में अलंकारों का स्थान—

मानव समाज सौन्दर्योपासक है, उसकी इसी प्रवृत्ति ने अलंकारों को जन्म दिया है। काव्य को सुन्दरतम बनाने के लिए अनेक उपकरणों की आवश्यकता पड़ती है। इन उपकरणों में एक अलंकार (Alankar) भी है। जिस प्रकार मानव अपने शरीर को अलंकृत करने के लिए विभिन्न प्रकार के वस्त्र, आभूषण आदि को धारण करके समाज में गौरवान्वित होता है, उसी प्रकार कवि भी कवितारूपी नारी को अलंकारों से अलंकृत करके गौरव प्राप्त करता है।

alankar - अलंकार

आचार्य दण्डी ने कहा भी है— “काव्यशोभाकरान् धर्मान् अलंकरान् प्रचक्षते।” अर्थात् काव्य के शोभाकार धर्म, अलंकार होते हैं। अलंकारों के बिना कवितारूपी नारी विधवा-सी लगती है। अलंकारों के महत्त्व का एक कारण यह भी है कि इनके आधार पर भावाभिव्यक्ति में सहायता मिलती है तथा काव्य रोचक एवं प्रभावशाली बनता है। और इससे अर्थ में चमत्कार उत्पन्न होता है तथा अर्थ को समझना सुगम हो जाता है।

अलंकार की परिभाषा अथवा अलंकार क्या है। अथवा अलंकार किसे कहते हैं?

  • काव्य की शोभा बढ़ाने वाले तत्वों अथवा शब्दों अथवा धर्म को अलंकार कहते है।
  • शरीर की सुन्दरता बढ़ाने के लिए जिस प्रकार मनुष्य ने विभिन्न प्रकार के आभूषणों व गहनों का प्रयोग किया, उसी प्रकार कवियों ने भाषा को सुन्दर बनाने के लिए अलंकारों का सृजन किया। काव्य की शोभा बढ़ाने वाले शब्दों को अलंकार कहते हैं। जिस प्रकार नारी के सौन्दर्य को बढ़ाने के लिए आभूषण होते हैं, ठीक उसी प्रकार भाषा के सौन्दर्य के उपकरणों को अलंकार कहते हैं।
  • संस्कृत के अलंकार सम्प्रदाय के प्रतिष्ठापक आचार्य दण्डी के शब्दों में अलंकार की परिभाषा— “काव्य शोभाकरान् धर्मान् अलंकरान् प्रचक्षतेअर्थात् काव्य के शोभाकारक धर्म (गुण) ‘अलंकार’ कहलाते हैं।

नोट— हिन्दी के कवि केशवदास एक अलंकारवादी कवि हैं।

अलंकार का अर्थ—

अलंकार का शाब्दिक अर्थ होता है ‘आभूषण या गहना’ जिस प्रकार स्वर्ण आदि के आभूषणों से शरीर की शोभा बढ़ती है उसी प्रकार काव्य अलंकारों से काव्य की शोभा बढ़ती है। अर्थात् जिस प्रकार आभूषण या गहना द्वारा शरीर को सजाया जाता है , ठीक उसी प्रकार अलंकारों द्वारा भाषा में चमत्कार व सुन्दरता का समावेश किया जाता है।

अलंकार के भेद अथवा अलंकार के प्रकार

अलंकार के तीन प्रकार अथवा भेद होते हैं, किन्तु प्रधान रूप से अलंकार के दो भेद माने जाते हैं — शब्दालंकार तथा अर्थालंकार

अलंकार के तीन भेद अथवा प्रकार निम्न हैं—

अलंकारअर्थ
a.शब्दालंकारशब्दों पर आश्रित अलंकार
b.अर्थालंकारअर्थ पर आश्रित अलंकार
c.आधुनिक / पाश्चात्य अलंकारआधुनिक काल में पाश्चात्य साहित्य से आए अलंकार

अलंकार के भेदों अथवा प्रकारों का संक्षिप्त परिचय—

अलंकार के तीनों भेदों का संक्षिप्त विवेचन इस प्रकार है—

शब्दालंकार की परिभाषा—

‘जब शब्दों द्वारा भाषा में सुन्दरता आती है। तो वह शब्दालंकार होता है।’

अथवा

‘जब कुछ विशेष शब्दों के कारण काव्य में चमत्कार उत्पन्न होता है तो वह शब्दालंकार कहलाता है।’ यदि इन शब्दों के स्थान पर उनके ही अर्थ को व्यक्त करने वाला कोई दूसरा शब्द रख दिया जाए तो वह चमत्कार समाप्त हो जाता है।

उदाहरणार्थ—

  1. सोना
  2. धतूरा

कनक-कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय।
वा खाए बौराय जग, या पाए ही बौराय।।

स्पष्टीकरण— यहाँ पर कनक का प्रयोग दो बार हुआ है जिसमें एक कनक का अर्थ है- सोना(स्वर्ण) और दूसरे कनक का अर्थ – धतूरा । अत: यहाँ कनक शब्द के कारण जो चमत्कार है। वह पर्यायवाची शब्द रखते ही समाप्त हो जाएगा।


अर्थालंकार की परिभाषा—

‘जहाँ काव्य में अर्थों द्वारा भाषा में सुन्दरता आती है, वहाँ अर्थालंकार होता है।’

अथवा

‘जहाँ काव्य में अर्थगत् चमत्कार होता है। वहाँ अर्थालंकार माना जाता है।’ इस अलंकार पर आधारित शब्दों के स्थान पर उनका कोई पर्यायवाची रख देने से भी अर्थगत् सौन्दर्य में कोई अन्तर नही पड़ता है।

उदाहरणार्थ—

चरण-कमल बन्दौ हरिराई।

स्पष्टीकरण— यहाँ पर कमल के स्थान पर कमल का पर्यायवाची शब्द जलज रखने पर भी अर्थगत् सौन्दर्य में कोई अन्तर नहीं पड़ेगा।


आधुनिक / पाश्चात्य अलंकार की परिभाषा —

आधुनिक काल में पाश्चात्य साहित्य से आए अलंकार आधुनिक / पाश्चात्य अलंकार कहलाते हैं।

उदाहरणार्थ—

जगीं वनस्पतियाँ अलसाई, मुख
धोती शीतल जल से।” — (प्रसाद)


शब्दालंकार

जिस अलंकार में शब्दों के प्रयोग के कारण कोई चमत्कार उपस्थित हो जाता है और उन शब्दों के स्थान पर समानार्थी दूसरे शब्दों के रख देने से वह चमत्कार समाप्त हो जाता है वहाँ पर शब्दालंकार माना जाता है।

शब्दालंकार के भेद—

शब्दालंकारों के मुख्यत: पाँच भेद इस प्रकार माने जाते हैं—

1. अनुप्रास अलंकार—

  1. छेकानुप्रास अलंकार
  2. वृत्यानुप्रास अलंकार
  3. लाटानुप्रास अलंकार
  4. श्रुत्यानुप्रास अलंकार
  5. अन्त्यानुप्रास अलंकार

2. यमक अलंकार

3. श्लेष अलंकार

4. वक्रोक्ति अलंकार—

  1. श्लेषमूला वक्रोक्ति
  2. काकुमूला वक्रोक्ति

5. वीप्सा अलंकार


अनुप्रास अलंकार

अनुप्रास अलंकार की परिभाषा— वर्णों की आवृत्ति को अनुप्रास कहते हैं अर्थात् ‘जहाँ समान वर्णों की बार-बार आवृत्ति होती है वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है।

अथवा

‘जब एक ही अक्षर वाक्य में एक से अधिक बार आये, तो वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है।

अनुप्रास अलंकार के लक्षण अथाव पहचान् चिह्न—

जहाँ व्यंजन वर्णों की आवृत्ति एक से अधिक बार होती है वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है।

अनुप्रास अलंकार का अर्थ—

अनुप्रास शब्द अनु तथा प्रास शब्दों के योग से बना है। अनु का अर्थ है— बार-बार तथा प्रास का अर्थ है— वर्ण। जहाँ स्वर की समानता के बिना भी वर्णों की बार-बार आवृत्ति होती है, वह अनुप्रास अलंकार होता है।

अनुप्रास अलंकार के उदाहरण—

क. भूरि-भूरि भेदभाव भूमि से गा दिया।

ख. रनि-नुजा माल रुवर बहु छाए।

ग. घुपति राघव राजा राम।

घ. बंदऊँ गुरु दुम रागा।

ङ. सुरुचि ुबास अनुरागा।। — (तुलसी)

स्पष्टीकरण— उपर्युक्त उदाहरणों के अन्तर्गत प्रथम में तथा दितीय में तथा तृतीय में व चतुर्थ में व पंचम में वर्ण की आवृत्ति के कारण अनुप्रास अलंकार है।

अनुप्रास अलंकार के भेद—

अनुप्रास अलंकार के मुख्य रुप में पाँच प्रकार हैं—

  1. छेकानुप्रास अलंकार
  2. वृत्यानुप्रास अलंकार
  3. लाटानुप्रास अलंकार
  4. श्रुत्यानुप्रास अलंकार
  5. अन्त्यानुप्रास अलंकार

छेकानुप्रास अलंकार की परिभाषा—

जब एक या अनेक वर्णों की आवृत्ति एक बार होती है, तब छेकानुप्रास अलंकार होता है।

छेकानुप्रास के लक्षण अथवा पहचान चिह्न—

एक या अनेक व्यंजनों की एक बार स्वरूपत: व क्रमत: आवृत्ति ही छेकानुप्रास अलंकार के लक्षण अथवा पहचान है।

छेकानुप्रास अलंकार के उदाहरण—

क. कहत कत परदेसी की बात।
ख. पीरी परी देह, छीनी राजत सनेह भीनी।

स्पष्टीकरण— उपर्युक्त उदाहरणों में प्रथम में वर्ण की तथा द्वितीय में वर्ण की आवृत्ति एक बार हुई है, अत: यहाँ छेकानुप्रास अलंकार है।

बंदऊ गुरु पद पदुम परागा।
सुरुचि सुबास सरस अनुरागा।।

स्पष्टीकरण— पद पदुम में पद एवं सुरुचि सुबास में सर एक ही स्वरुप के हैं। अत: यहाँ स्वरुप की आवृत्ति है। पद पदुम में के बाद तथा सुरुचि सरस में के बाद है। अत: यहाँ क्रम की आवृत्ति है इसलिए यह एक छेकानुप्रास अलंकार का उदाहरण है।

वृत्यानुप्रास अलंकार की परिभाषा—

जहां एक वर्ण की अनेक बार आवृत्ति हो, वहाँ वृत्यानुप्रास अलंकार होता है।

वृत्यानुप्रास अलंकार के लक्षण अथवा पहचान चिह्न—

अनेक व्यंजनों की अनेक बार स्वरुपत: व क्रमश: आवृत्ति ही वृत्यानुप्रास अलंकार की पहचान है।

वृत्यानुप्रास अलंकार के उदाहरण—

क. तरनि-तनुजा तट तमाल तरुवर बहु छाए।
ख. रघुपति राघव राजा राम।
ग. कारी कूर कोकिल कहाँ का बैर काढ़ति री।
घ. कलावती केलिवती कलिन्दजा।

स्पष्टीकरण— उपर्युक्त उदाहरणों में, प्रथम में वर्ण की, द्वितीय में वर्ण की, तृतीय में वर्ण की तथा चतुर्थ उदाहरण में की अनेक बार आवृत्ति हुई है। अत: यहाँ वृत्यनुप्रास अलंकार है।

श्रृत्यनुप्रास अलंकार की परिभाषा—

जब कण्ठ, तालु, दन्त आदि किसी एक ही स्थान से उच्चरित होनेवाले वर्णों की आवृत्ति होती है, तब वहाँ श्रृत्यनुप्रास अलंकार होता है।

श्रृत्यनुप्रास अलंकार के लक्षण अथवा पहचान—

कण्ठ, तालु दन्त आदि किसी एक ही स्थान से उच्चरित होने वाले वर्णों की आवृत्ति ही श्रृत्यनुप्रास अलंकार की पहचान है।

श्रृत्यनुप्रास अलंकार के उदाहरण—

तुलसीदास सीदत निसिदिन देखत तुम्हारि निठुराई ।

स्पष्टीकरण— उपर्युक्त उदाहरण में दन्त्य वर्णों त , द कण्ठ वर्ण तथा तालु वर्ण की आवृत्ति हुई है; अत: यहाँ श्रृत्यनुप्रास अलंकार है।

लाटानुप्रास अलंकार की परिभाषा—

जहाँ शब्द और अर्थ की आवृत्ति हो; अर्थात् जहाँ एकार्थक शब्दों की आवृत्ति हो, तो परन्तु अन्वय करने पर अर्थ भिन्न हो जाए; वहां लाटानुप्रास अलंकार होता है।

लाटानुप्रास अलंकार के लक्षण अथवा पहचान—

तात्पर्य मात्र के भेद से शब्द व अर्थ दोनों की पुनरुक्ति ही लाटानुप्रास अलंकार के लक्षण अथवा पहचान है।

लाटानुप्रास अलंकार के उदाहरण व स्पष्टीकरण—

लड़का तो लड़का ही है।(शब्द की पुनरुक्ति)

  • सामान्य लड़का
  • रुप बुद्धि शीलादि गुण सम्पन्न लड़का

पूत सपूत तो क्यों धन संचै ।
पूत कपूत तो क्यों धन संचै।।

अर्थ व स्पष्टीकरण— यह एक ही अर्थ वाले शब्द की आवृत्ति हो रही है, किन्तु अन्वय के कारण अर्थ बदल रहा है: जैसे– पुत्र यदि सपूत हो तो धन संचय की कोई आवश्यकता नहीं होती; क्योंकि वह स्वयं ही कमा लेगा और यदि पुत्र कपूत हो तो भी धन संचय की आवश्यकता नहीं होती; क्योंकि वह सारे धन को नष्ट कर देगा।

अन्त्यानुप्रास अलंकार की परिभाषा—

जब छन्द के शब्दों के अन्त में समान स्वर या व्यंजन की आवृत्ति हो, तो वहाँ अन्त्यानुप्रास अलंकार होता है।

अन्त्यानुप्रास अलंकार के लक्षण अथवा पहचान—

छन्द के शब्दों के अन्त में समान स्वर या व्यंजन की आवृत्ति ही अन्त्यानुप्रास अलंकार की पहचान है।

अन्त्यानुप्रास अलंकार के उदाहरण—

कहत नटत रीझत खिझत, मिलत खिलत लजियात।
भरे भौन में करतु हैं, नैननु ही सौं बात।।

स्पष्टीकरण— उपर्युक्त उदाहरण में, छन्द के अन्त में त व्यंजन की आवृत्ति हुई है, अत: यहाँ अन्त्यानुप्रास अलंकार है।


यमक अलंकार

यमक अलंकार की परिभाषा—

जहाँ एक शब्द अथवा शब्द समूह का एक से अधिक बार प्रयोग हो, किन्तु उसका अर्थ प्रत्येक बार भिन्न हो, तो वहाँ यमक अलंकार होता है।

यमक अलंकार का अर्थ—

यमक का अर्थ होता है— युग्म या जोड़ा । अथवा शब्द या शब्द समूह ।

यमक अलंकार के लक्षण अथवा पहचान—

शब्दों की आवृत्ति (जहाँ एक शब्द एक से अधिक बार प्रयुक्त हो और उसके अर्थ अलग-अलग हों) ही यमक अलंकार के लक्षण हैं।

यमक अलंकार के उदाहरण—

ऊँचे घोर मंदर के अंदर रहनवारी ।
ऊँचे घोर मंदर के अंदर रहाती है।।

स्पष्टीकरण— उपर्युक्त उदाहरण में ऊँचे घोर मंदर के दो भिन्न अर्थ हैं— 1. महल तथा 2. पर्वत-कन्दराएँ; अत: यहाँ यमक अलंकार है।

कनक-कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय।
वा खाए बौराय जग, या पाये बौराय।।

स्पष्टीकरण— उपर्युक्त उदाहरण में कनक शब्द की एक बार आवृत्ति हुई है। किन्तु अर्थ भिन्न-भिन्न है— 1. सोना 2. धतूरा।


श्लेष अलंकार

श्लेष अलंकार की परिभाषा—

जिस शब्द के एक से अधिक अर्थ होते हैं, उसे श्लिष्टकहते हैं। इस प्रकार जहाँ किसी शब्द के एक बार प्रयुक्त होने पर एक से अधिक अर्थ होते हैं, वहाँ श्लेष अलंकार होता है। —:अथवा:—

जहाँ पर ऐसे शब्दों का प्रयोग हो जिनसे एक से अधिक अर्थ निकलते हो, वहाँ पर श्लेष अलंकार होता है।

श्लेष अलंकार के लक्षण या पहचान—

जहाँ एक शब्द में एक से अधिक अर्थ जुड़े होते है (जहाँ कोई शब्द एक ही बार प्रयुक्त हो किन्तु प्रसंग भेद में उसके अर्थ अलग-अलग हो) तो वही श्लेष अलंकार की पहचान होता है।

श्लेष अलंकार के उदाहरण—

अलंकार

रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून।
पानी गये न ऊबरै, मोती मानुस चून।।

  • मोती — चमक
  • मानुस — प्रतिष्ठा
  • चून — जल

स्पष्टीकरण— उपर्युक्त उदाहरण में तीसरी बार प्रयुक्त पानी शब्द श्लिष्ट है और इसके तीन अर्थ हैं— 1. चमक (मोती के पक्ष में) 2. प्रतिष्ठा (मनुष्य के पक्ष में) 3. जल (आटे के सम्बंध में) ; अत: यहाँ श्लेष अलंकार है।

—:अथवा:—

चिरजोवो जोरी जुरे क्यों न सनेह गम्भीर।
को घटि ये वृषभानुजा, वे हलधर के बीर।।

स्पष्टीकरण— उपर्युक्त उदाहरण में वृषभानुजा के दो अर्थ हैं— 1. राजा वृषभानु की पुत्री (राधा) तथा 2. वृषभ (बैल) की अनुजा(बहन) गाय ।

इसी प्रकार हलधर के भी दो अर्थ हैं— 1. बलराम 2. हल को धारण करने वाला बैल। अत: यहाँ वृषभानुजा तथा हलधर में श्लेष अलंकार है।


वक्रोक्ति अलंकार

वक्रोक्ति अलंकार की परिभाषा—

जहाँ प्रत्यक्ष अर्थ के अतिरिक्त भिन्न अर्थ हो, वहाँ वक्रोक्ति अलंकार होता है।

वक्रोक्ति अलंकार के लक्षण या पहचान चिन्ह—

प्रत्यक्ष अर्थ के अतिरिक्त भिन्न अर्थ ही वक्रोक्ति अलंकार के लक्षण या पहचान है।

वक्रोक्ति अलंकार के उदाहरण—

एक कबूतर देख हाथ में पूछा कहाँ अपर है?
उसने कहा अपर कैसा ? वह उड़ गया सपर है।। (गुरुभक्त सिंह)

स्पष्टीकरण— उपर्युक्त उदाहरण में जहाँगीर ने दूसरे कबूतर के बारे में पूछने के लिए अपर (दूसरा) शब्द का प्रयोग किया है जबकि उत्तरार्ध्द में नूरजहाँ ने अपर (पंख वाला) अर्थ का उत्तर दिया है इसलिए यहाँ वक्रोक्ति अलंकार होता है।

वक्रोक्ति अलंकार के भेद—

वक्रोक्ति अलंकार को मुख्यत: दो भागों में बाँटा गया है—

  1. श्लेषमूला वक्रोक्ति
  2. काकुमूला वक्रोक्ति

श्लेषमूला वक्रोक्ति अलंकार की परिभाषा—

जब श्लेष के द्वारा वक्रोक्ति होती है, तो वहाँ श्लेषमूला वक्रोक्ति अलंकार होता है।

श्लेषमूला वक्रोक्ति अलंकार के लक्षण आ पहचान चिन्ह—

श्लेष के द्वारा वक्रोक्ति ही श्लेषमूला वक्रोक्ति अलंकार के लक्षण हैं।

श्लेषमूला वक्रोक्ति अलंकार के उदाहरण—

एक कबूतर देख हाथ में पूछा कहाँ अपर है?
उसने कहा अपर कैसा ? वह उड़ गया सपर है।। (गुरुभक्त सिंह)

स्पष्टीकरण— उपर्युक्त उदाहरण में जहाँगीर ने दूसरे कबूतर के बारे में पूछने के लिए अपर (दूसरा) शब्द का प्रयोग किया है जबकि उत्तरार्ध्द में नूरजहाँ ने अपर बिना पर (पंख वाला) अर्थ का उत्तर दिया है इसलिए यहाँ श्लेषमूला वक्रोक्ति अलंकार होता है।

काकुमूला वक्रोक्ति अलंकार की परिभाषा—

जहाँ काकु (ध्वन-विकार या आवाज में परिवर्तन) के द्वारा वक्रोक्ति होती है, वहाँ काकुमूला वक्रोक्ति अलंकार होता है।

काकुमूला वक्रोक्ति अलंकार के लक्षण या पहचान चिन्ह—

काकु (आवाज में परिवर्तन) के द्वारा वक्रोक्ति ही काकुमूला वक्रोक्ति अलंकार के पहचान चिन्ह होते हैं।

काकुमूला वक्रोक्ति अलंकार के उदाहरण—

आप जाइए तो। (आप जाए)
आप जाइए तो? (आप नहीं जाइए)

स्पष्टीकरण — उपर्युक्त उदाहरण में चूँकि काकु ( आवाज में परिवर्तन) के द्वारा वक्रोक्ति हो रहा है इसलिए यहाँ काकुमूला वक्रोक्ति अलंकार की उपस्थित है।


वीप्सा अलंकार

वीप्सा अलंकार की परिभाषा—

वीप्सा शब्द का अर्थ होता है— दुहराना। अर्थात् मनोभावों को प्रकट करने के लिए शब्द का दोहराना ही वीप्सा अलंकार कहलाता है।

वीप्सा अलंकार के लक्षण या पहचान चिन्ह—

मनोभावों को प्रकट करने के लिए शब्द दोहराना ही वीप्सा अलंकार की पहचान चिन्ह है।

वीप्सा अलंकार के उदाहरण—

छि: छि:, राम राम, चुप,चुप, देखो, देखो।

स्पष्टीकरण—उपर्युक्त उदाहरणों में शब्द को दोहराया गया है; अत: यहाँ वीप्सा अलंकार है।


अर्थालंकार

जहाँ अर्थ क् माध्यम से काव्य में चमत्कार उत्पन्न होता है, वहाँ अर्थालंकार होता है। अर्थात् काव्य में अर्थगत चमत्कार होता है। अर्थालंकार पर आधारित शब्दों से भी अर्थगत सौन्दर्य में कोई अन्तर नहीं पड़ता।

अर्थालंकार के भेद—

अर्थालंकार के अनेक भेद माने जाते हैं जिनका विवरण निम्नलिखित इस प्रकार हैं—

  1. उपमा अलंकार—
  • पूर्णोपमा
  • लुप्तोपमा
  • रसनोपमा
  • मालोपमा

2. रूपक अलंकार—

  • सांगरूपक
  • निरंग रूपक
  • परम्परिक रूपक

3. उत्प्रेक्षा अलंकार—

  • वस्तूत्प्रेक्षा
  • हेतूत्प्रेक्षा
  • फलोत्प्रेक्षा

4.प्रतीप अलंकार

5. भ्रान्तिमान अलंकार या भ्रम अलंकार

6. सन्देह अलंकार

7.दृष्टांट अलंकार

8. अतिशयोक्ति अलंकार

9. अनन्वय( अन्वय) अलंकार

10. उपमेयोपमा अलंकार

11. अपहुति अलंकार

12. उल्लेख अलंकार

13. स्मरण अलंकार

14. तुल्ययोगिता अलंकार

15. दीपक अलंकार

16. प्रतिवस्तूपमा अलंकार

17. निदर्शना अलंकार

18. व्यतिरेक अलंकार

19. सहोक्ति अलंकार

20. विनोक्ति अलंकार

21. समासोक्ति अलंकार

22. अन्योक्ति या अप्रस्तुत प्रशंसा अलंकार

23. पर्यायोक्ति अलंकार

24. व्याजस्तुति (व्याज-निन्दा) अलंकार

25. परिकर अलंकार

26. परिकराकुँर अलंकार

27. आक्षेप अलंकार

28. विरोधाभास अलंकार

29. विभावना अलंकार

30. विशेषोक्ति अलंकार

31. असंगति अलंकार

32. विषम अलंकार

33. कारणमाला अलंकार

34. एकावली अलंकार

35. काव्यलिंग अलंकार (लिंग कारण)

36. सार अलंकार

37. अनुमान अलंकार

38. यथासंख्य अलंकार या क्रम अलंकार

39. अर्थापन्ति अलंकार

40. परिसंख्या अलंकार

41. सम अलंकार

42. तद्गुण अलंकार

43. अतद्गुण अलंकार

44. मीलित (मिल- जाना) अलंकार

45. उन्मीलित अलंकार

46. सामान्य अलंकार

47. स्वभावोक्ति अलंकार

48. व्याजोक्ति अलंकार (व्याज- छल बहाना)

49. अर्थान्तरन्यास अलंकार

50. लोकोक्ति अलंकार

51. उदाहरण अलंकार ।


उपमा अलंकार

उपमा अलंकार की परिभाषा—

उपमेय (जिसके लिए उपमा दी जाती है) और उपमान (उपमेय की जिसके साथ तुलना की जाती है।) के समान धर्मकथन को उपमा अलंकार कहते हैं।

—:अथवा:—

समान धर्म के आधार पर जहाँ किसी एक वस्तु या व्यक्ति की समानता या तुलना किसी दूसरे वस्तु या व्यक्ति से की जाती है, वहाँ उपमा अलंकार माना जाता है।

उपमा अलंकार का अर्थ—

उपमा का अर्थ है— सादृश्य, समानता तथा तुल्यता । जहाँ पर उपमेय की उपमान से किसी समान धर्म के आधार पर समानता या तुलना की जाए, वहाँ उपमा अलंकार होता है।

उपमा अलंकार के लक्षण या पहचान चिन्ह—

भिन्न पदार्थों का सादृश्य: प्रतिपादन ही, उपमा अलंकार की पहचान है।

उपमा अलंकार के अंग—

उपमा अलंकार के प्रमुख चार अंग है जो निम्न इस प्रकार हैं—

1. उपमेय या प्रस्तुत अलंकार
2. उपमान या अप्रस्तुत अलंकार
3. समान (साधारण) ध्रम या समान गुण
4. सादृश्य वाचक शब्द या वाचक शब्द ।


1. उपमेय की परिभाषा—

जिसकी उपमा दी जाय अर्थात् वह वर्ण्य विषम, जिसके लिए उपमा की योजना की जाती है, उसे उपमेय कहते हैं।

2. उपमान की परिभाषा—

जिससे उपमा की जाए, वह उपमान होता है।

3. साधारण धर्म—

उपमेय व उपमान में पाया जाने वाला उभयनिष्ठ गुण अथवा उपमेय एवं उपमान के बीच जो भाव, रूप, गुण, क्रिया आदि समान धर्म हो, उसे साधारण धर्म कहते हैं।

4. वाचक शब्द—

उपमेय और उपमान की समता बताने वाले शब्द अथवा समानता को प्रकट करने वाले (सा, इव, सम, समान, सों, ऐसा, जैसा, ज्यों, सादृश्य) आदि शब्दों को वाचक शब्द कहते हैं।

उपमा अलंकार के उदाहरण—

मुख मयंक सम मंजु मनोहर ।

स्पष्टीकरण— उपर्युक्त उदाहरण में—

उपमेय – मुख
उपमान – मयंक
साधारण धर्म – मंजु मनोहर
वाचक शब्द – सम

अत: यहाँ उपमा अलंकार का पूर्ण परिपाक हुआ है।

—:अथवा:—

हरि-पद कोमल कमल-से

स्पष्टीकरण—

उपमेय – हरि-पद
उपमान – कमल
साधारण धर्म – कोमलता
वाचक शब्द –से

प्रस्तुत उदाहरण में उपमा अलंकार के सभी अंग मौजूद हैं। अत: यह उपमा अलंकार का उदाहरण है।


उपमा अलंकार के भेद—

उपमा अलंकार के प्राय: चार भेद किये जाते हैं। इनका संक्षिप्त विवेचन निम्नलिखित है—

क. पूर्णोपमा
ख. लुप्तोपमा
ग. रसनोपमा
घ. मालोपमा

(क). पूर्णोपमा अलंकार की परिभाषा—

पूर्णोपमा अलंकार में उपमा के चारों अंग उपमेय, उपमान, साधारण धर्म और वाचक शब्द स्पष्ट रूप से मौजूद होते हैं।

उदाहरण— पीपर पात सरिस मन डोला।

स्पष्टीकरण— उपर्युक्त उदाहरण में उपमा के चारों अंग उपमान (पीपर पात), उपमेय (मन), साधारण धर्म (डोला) तथा वाचक शब्द (सम) । स्पष्ट रूप से निर्दिष्ट हो रहा है; अत: यहाँ पूर्णोपमा अलंकार है।

—:अथवा:—

मुख चन्द्र-सा सुन्दर है।

स्पष्टीकरण— उपर्युक्त उदाहरण में —

उपमेय – मुख
उपमान –
चन्द्र
साधारण धर्म –
सुन्दरता
वाचक शब्द –
सा

प्रस्तुत उदाहरण में उपमा अलंकार के चारों अंग मौदूद है इसलिए यह पूर्णोपमा अलंकार का उदाहरण है।

(ख). लुप्तोपमा अलंकार की परिभाषा—

उपमेय, उपमान, साधारण धर्म तथा वाचक शब्द में से किसी एक या अनेक अंगों के लुप्त होने पर लुप्तोपमा अलंकार होता है। लुप्तोपमा अलंकार में उपमा के तीन अगों तक के लोप की कल्पना की गई है।

उदाहरण— नील सरोरुह स्याम तरुन अरुन वारिज नयन

स्पष्टीकरण— उपर्युक्त उदाहरण में नयन उपमेय सरोरुह और वारिज उपमान तथा नील और अरुन समान धर्म है। समान आदिवाचक शब्द का लोप हुआ है; अत: यहाँ लुप्तोपमा अलंकार है।

—:अथवा:—

मुख चन्द्र-सा है।

स्पष्टीकरण— प्रस्तुत उदाहरण में मुख उपमेय, चन्द्र उपमान तथा सा सादृश्य वाचक शब्द है। यहाँ पर समान धर्म सुन्दरता का लोप हुआ है अत: यहाँ लुप्तोपमा अलंकार है।

(ग). रसनोपमा अलंकार की परिभाषा—

जिस प्रकार एक कड़ी दूसरी कड़ी से क्रमश: जुड़ी रहती है; ठीक उसी प्रकार रसनोपमा अलंकार में उपमेय-उपमान एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं।

उदाहरण—

सगुन ज्ञान सम उद्यम, उद्यम सम पल जान।
फल समान पुनि दान है, दान सरिस सनमान।।

स्पष्टीकरण— उपर्युक्त उदाहरण में उद्यम, फल, दान और सनमान उपमेय अपने उपमानों के साथ श्रृंखलाबद्ध रूप से प्रस्तुत किये गये है। अत: यहाँ रसनोपमा अलंकार है।

(घ). मालोपमा अलंकार की परिभाषा—

मालोपमा अलंकार का तात्पर्य है— माला के रूप में उपमानों की श्रृंखला। एक ही उपमेय के लिए जब अनेक उपमानों का गुम्फरन किया जाता है, तब मालोपमा अलंकार होता है।

उदाहरण—

पछतावे की परछाँही-सी, तुम उदास छाई हो कौन?
दुर्बलता की अंगराई-सी, अपराधी सी भय से मौन ।

स्पष्टीकरण— उपर्युक्त उदाहरण में एक उपमेय के लिए अनेक उपमान प्रस्तुत किये गये हैं। अत: यहाँ मालोपमा अलंकार है।


रूपक अलंकार

रूपक अलंकार की परिभाषा—

जहाँ उपमेय में उपमान का भेदरहित आरोप होता है, वहाँ रूपक अलंकार होता है। यानी उपमेय और उपमान में कोई अन्तर न दिखाई देता है।

—:अथवा:—

जहाँ उपमेय में उपमान का निषेधरहित आरोप हो, वहाँ रूपक अलंकार होता है।

रूपक अलंकार के लक्षण अथवा पहचान चिन्ह—

उपमेय में उपमान का निषेधरहित आरोप ही रूपक अलंकार के लक्षण माने जाते हैं।

रूपक अलंकार के उदाहरण—

जो चिन्ता की पहली रेखा,
अरे विश्व-वन की व्याली।
ज्वालामुखी स्फोट के भीषण,
प्रथम कम्प-सी मतवाली।।

स्पष्टीकरण— उपर्युक्त उदाहरण में चिन्ता उपमेय में विश्व-वन की व्याली आदि उपमानों का आरोप किया गया है। अत: यहाँ रूपक अलंकार है।

—:अथवा:—

गिरा-अनिल मुख पंकज रोकी।
प्रकट न लाज-निशा अवलोकी।।

स्पष्टीकरण— यहाँ गिरा(वाणी) में भौंरे का, मुख में कमल और लाज में निशा का निषेधरहित आरोप होने से रूपक अलंकार है।

रूपक अलंकार के भेद अथवा प्रकार—

आचार्यों ने रूपक अलंकार के अनगिनत भेद एवं उपभेद किये हैं किन्तु इसके तीन प्रधान भेद निम्न इस प्रकार हैं—

(क). सांगरूपक
(ख). निरंग रूपक
(ग). परम्परिक रूपक

(क). सांगरूपक अंलकार की परिभाषा —

जहाँ अवयवोंरहित उपमान का आरोप होता है वहाँ सांगरूपक अंलकार होता है।

सांगरूपक अंलकार के उदाहरण—

रनित भृंग-घंटावली, झरति दान मधु-नीर।
मंद-मंद आवत चल्यौ, कुंजर कुंज-समीर।।

स्पष्टीकरण— उपर्युक्त उदाहरण में समीर में हाथी का, भृंग में घण्टे का और मकरंद में दान (मद-जल) का आरोप किया गया है। इस प्रकार वायु के अवयवों पर हाथी का आरोप होने के कारण यहाँ सांगरूपक अंलकार है।

(ख). निरंग रूपक अलंकार की परिभाषा—

जहाँ अवयवों से रहित केवल उपमेय का उपमान पर अभेद आरोप होता है। वहाँ निरंग रूपक अलंकार होता है।

निरंग रूपक अलंकार के उदाहरण—

इस हृदय-कमल का घिरना, अलि-अलको की उलझन में
आँसू करन्द का गिरना, मिलना नि:श्वास पवन में ।

स्पष्टीकरण— उपर्युक्त उदाहरण में हृदय (उपमेय) पर कमल (उपमान) का; अलकों (उपमेय) पर अलि (उपमान), आँसू (उपमेय) पर करन्द पवन (उपमान) का आरोप किया गया है; अत: यहाँ निरंग रूपक अलंकार है।

(ग). परम्परिक रूपक अलंकार की परिभाषा—

जहाँ उपमेय पर एक आरोप दूसरे का कारण होता है; वहाँ परम्परिक रूपक अलंकार होता है।

परम्परिक रूपक अलंकार के उदाहरण—

बाड़व-ज्वाला सोती थी, इस प्रणय सिन्ध के तल में।
प्यासी मछली सी आँखें, थी विकल रूप के जल में।।

स्पष्टीकरण — उपर्युक्त उदाहरण में आँखों (उपमेय) पर मछली (उपमान) का आरोप, रूप (उपमेय) पर जल (उपमान) का आरोप के कारण किया गया है। अत: यहाँ परम्परिक रूपक अलंकार है।


उत्प्रेक्षा अलंकार

उप्रेक्षा अलंकार की परिभाषा—

जब उपमेय को उपमान से भिन्न जानते हुए भी उसमें उपमान की सम्भावना की जाती है तब उप्रेक्षा अलंकार होता है।

—:अथवा:—

जहाँ उपमेय में उपमान की सम्भावना की जाती है, वहां उप्रेक्षा अलंकार होता है। उप्रेक्षा को व्यक्त करने के लिए प्राय: मनु, मनहुँ, मानो, जानेहुँ, जानो आदि वाचक शब्दों का प्रयोग किया जाता है।

उप्रेक्षा अलंकार के लक्षण या पहचान चिन्ह—

उपमेय में उपमान की सम्भावना ही उप्रेक्षा अलंकार के लक्षण या पहचान चिन्ह है। (वाचक शब्द— मनु, मनहुँ, मानो, जानेहुँ, जानो आदि)

उप्रेक्षा अलंकार के उदाहरण—

सोहत ओढ़ै पीटु पटु, स्याम सलोने गात।
मनौ नीलमनणि-सैल पर, आतपु परयौ प्रभात।।

स्पष्टीकरण— उपर्युक्त उदाहरण में श्रीकृष्ण के श्याम शरीर (उपमेय) पर नीलमणियों के पर्वत (उपमान) की तथा पीट-पट (उपमेय) पर प्रभात की धूप (उपमान) की सम्भावना की गई है; अत: यहाँ उप्रेक्षा अलंकार है।

—:अथवा:—

मुख मानो चन्द्र है।

स्पष्टीकरण— यहाँ मुख (उपमेय) का चन्द्र (उपमान) से सम्भावना की गई है। अत: यह उप्रेक्षा अलंकार का उदाहरण है।

उप्रेक्षा अलंकार के प्रकार— उप्रेक्षा अलंकार के तीन प्रमुख भेद निम्नलिखित है—

(क). वस्तूत्प्रेक्षा अलंकार
(ख). हेतूत्प्रेक्षा अलंकार
(ग). फलोत्प्रेक्षा अलंकार

(क). वस्तूत्प्रेक्षा अलंकार की परिभाषा—

वस्तूत्प्रेक्षा अलंकार में एक वस्तु की दूसरी वस्तु के रूप में सम्भावना की जाती है।

वस्तूत्प्रेक्षा अलंकार के उदाहरण—

सोहत ओढ़ै पीट पटु, स्याम सलोने गात।
मनौ नीलमनणि-सैल पर, आतपु परयौ प्रभात।।

स्पष्टीकरण— यहाँ श्रीकृष्ण के श्याम-गात में नील-मणि सैल की तथा पीट-पटु में प्रभात के आतप (धूप) की सम्भावना करने से वस्तूत्प्रेक्षा अलंकार है।

(ख). हेतूत्प्रेक्षा अलंकार की परिभाषा —

जहाँ अहेतु में हेतू मानकर सम्भावना की जाती है, वहाँ हेतूत्प्रेक्षा अलंकार होता है।

हेतूत्प्रेक्षा अलंकार के उदाहरण—

मानहुँ विधि वन-अच्छ छवि, स्वच्छ राखिबै काज।
दृग-पग पौंछन कौ करे, भूषन पायन्दाज।।

स्पष्टीकरण— उपर्युक्त उदाहरण में हेतु आभूषण न होने पर भी उसकी पायदान के रूप में उप्रेक्षा की गयी है, अत: यहाँ हेतूत्प्रेक्षा अलंकार है।

(ग). फलोत्प्रेक्षा अलंकार की परिभाषा—

जहाँ अफल में फल की सम्भावना का वर्णन हो वहाँ फलोत्प्रेक्षा अलंकार होता है।

फलोत्प्रेक्षा अलंकार के उदाहरण—

पुहुप सुगन्ध करहिं एहि आसा।
मकु हिरकाइ लेइ हम्ह पासा।।

स्पष्टीकरण— पुष्पों में स्वाभाविक रुप से सुगन्ध होती है, किन्तु यहाँ जायसी ने पुष्पों की सुगन्ध विकीर्ण होने का फल बताया है। कवि का तात्पर्य यह है कि पुष्प इसलिए सुगन्ध विकीर्ण है कि सम्भवत: पदमावती उन्हें अपनी नासिका से लगा ले। इस प्रकार उपर्युक्त उदाहरण में अफल में फल की सम्भावना की गई है। अत: यहाँ फलोत्प्रेक्षा अलंकार है।

प्रतीप अलंकार

प्रतीप अलंकार की परिभाषा—

प्रतीप शब्द का अर्थ है— विपरीत । इस अलंकार में उपमा अलंकार से विपरीत स्थिति होती है। अर्थात् जहां उपमान का अपकर्ष वर्णित हो, वहाँ प्रतीप अलंकार होता है। प्रसिद्ध उपमान को उपमेय रूप में कल्पित किया जा सकता है।

प्रतीप अलंकार के लक्षण या पहचान चिन्ह— उपमा का उल्टा (प्रसिद्ध उपमान को उपमेय बना देना) ही प्रतीप अलंकार के लक्षण है।

प्रतीप अलंकार के उदाहरण— मुख(उपमान) सा चन्द्र(उपमेय) है।

—:अथवा:—

देत मुकुति सुन्दर हरषि, सुनि परताप उदार।
है तेरी तरवार सी, कालिंदी की धार।।

स्पष्टीकरण— प्राय: तलवार की तुलना नदी की तेज धार से की जाती है, किन्तु यहाँ कलिन्दी की धार (उपमान) को तलवार की धार(उपमेय) के समान बताया गया है; अत: उपर्युक्त उदाहरण में प्रसिद्ध उपमान का अपकर्ष होने के कारण प्रतीप अलंकार है।


भ्रान्तिमान या भ्रम अलंकार

भ्रान्तिमान या भ्रम अलंकार की परिभाषा— जहाँ समानता के कारण एक वस्तु में किसी दूसरी वस्तु का भ्रम हो, वहाँ भ्रान्तिमान या भ्रम अलंकार होता है।

—:अथवा:—

यहाँ समानता के कारण भ्रमवश उपमेय (जिसके लिए उपमा दी जाती है) में उपमान (उपमेय की जिसके साथ तुलना की जाती है) का निश्चयात्मक ज्ञान हो, वहाँ भ्रान्तिमान या भ्रम अलंकार होता है।

भ्रान्तिमान या भ्रम अलंकार के लक्षण या पहचान चिन्ह— सादृश्य या समानता के कारण एक वस्तु को दूसरी वस्तु मान लेना ही भ्रान्तिमान या भ्रम अलंकार के लक्षण अथवा पहचान चिन्ह है। ये है, या वो है भी इसके लक्षण है।

भ्रान्तिमान या भ्रम अलंकार के उदाहरण—

पेशी समझ माणिक्य को,
वह विहग देखो ले चला।

स्पष्टीकरण— यहाँ अत्यन्त समानता के कारण किसी लाल रंग की मणि को मांस पेशी समझने की भूल के कारण पक्षी उठाकर ले गया है। भूल के अनुसार कार्य करने से यहाँ भ्रान्तिमान या भ्रम अलंकार है।

—:अथवा:—

पांय महावर देन को, नाइन बैठी आय।
फिरि-फिरि जानि महावरी, एड़ी मीड़ति जाय।।

नाक का मोती अधर की क्रान्ति से,
बीज दाड़िम का समझकर भ्रान्ति से,
देख उसको ही हुआ शुक मौन,
सोचता है अन्य शुक यह कौन है?

स्पष्टीकरण— उपर्युक्त उदाहरण में लाल एड़ी (उपमेय) और महावर (उपमान) में लाल रंग की समानता के कारण नाइन को भ्रम उत्पन्न हो गया है तथा द्वितीय उदाहरण में तोता उर्मिला (लक्ष्मण की पत्नी) की नाक के मोती को भ्रमवश अनार का दाना और उसकी नाक को दूसरा तोता समझ कर भ्रमित हो जाता है; अत: यहाँ भ्रान्तिमान या भ्रम अलंकार है।

—:अथवा:—

चिंटू-पिंटू की मम्मी ने सिर बाँध रखा दो चोटी।
दोनों समझे सांप चढ़े है, छोड़-छाड़ भागे रोटी।

स्पष्टीकरण— उपर्युक्त उदाहरण में में चिंटू- पिंटू ने अपनी माँ की चोटी को भ्रमवश साँप समझ कर डर के माने रोटी को छोड़कर दूर भाग खड़े हुए। अत: यहाँ भ्रान्तिमान या भ्रम अलंकार है।


सन्देह अलंकार

सन्देह अलंकार की परिभाषा— जब किसी वस्तु में उसी के समान दूसरी वस्तु का सन्देह हो, किन्तु निश्चयात्मक ज्ञान न हो, वहाँ सन्देह अलंकार होता है।

—:अथवा:—

जहाँ एक वस्तु के सम्बन्ध में अनेक वस्तुओं का सन्देह हो और समानात के कारण अनिश्चय (संशय) की मनोदशा बनी रहे। वहाँ सन्देह अलंकार होता है।

सन्देह अलंकार के लक्षण या पहचान चिन्ह— उपमेय में उपमान का सन्देह ही सन्देह अलंकार के लक्षण या पहचान चिन्ह है।

सन्देह अलंकार के उदाहरण— यह मुख है या चन्द्र है।

स्पष्टीकरण— प्रस्तुत उदाहरण में मुख (उपमय) को देखकर यह निश्चय नही हो पाता कि यह मुख ही है या चन्द्र है इसलिए यहां सन्देह अलंकार है।

सारी बिच नारी है कि नारी बिच सारी है।
कि सारी ही की नारी है, कि नारी ही की सारी है।।

स्पष्टीकारण— प्रस्तुत उदाहरण में नारी और सारी के विषय में संशय है, अत: यहाँ सन्देह अलंकार है।


दृष्टान्त अलंकार

दृष्टान्त अलंकार की परिभाषा— जहाँ उपमेय-उपमान के धर्म में भिन्नता होते हुए भी बिम्ब-प्रतिबिम्ब भाव से कथन किया जाए वहाँ दृष्टान्त अलंकार होता है, इसमें प्रथम पंक्ति का प्रतिबिम्ब द्वितीय पंक्ति में झलकता है।

दृष्टान्त अलंकार के लक्षण या पहचान चिन्ह— उपमेय-उपमान में बिम्ब-प्रतिबिम्ब भाव ( भाव-साम्य— एक ही आशय की दो भिन्न अभिव्यक्ति) ही दृष्टान्त अलंकारके लक्षण है।

दृष्टान्त अलंकार के उदाहरण—

दुसह दुराज प्रजान को, क्यौं न बढ़ै दु:ख-द्वंद।
अधिक अँधेरो जग करत, मिलि मावस रवि-चन्द्र।।

स्पष्टीकरण— उपर्युक्त उदाहरण में प्रथम पंक्ति उपमेय वाक्य है तथा दूसरी पंक्ति उपमान वाक्य है, अर्थात् प्रथम पंक्ति का प्रतिबिम्ब द्वितीय पंक्ति में झलकता है। अत: यहाँ दृष्टान्त अलंकार है।


अतिशयोक्ति अलंकार

अतिशयोक्ति अलंकार की परिभाषा— जहाँ किसी वस्तु, घटना अथवा परिस्थिति की वास्तविकता का बढ़ा-चढ़ाकर वर्णन किया जाता है, वहां अतिशयोक्ति अलंकार होता है।

अतिशयोक्ति अलंकार के लक्षण या पहचान चिन्ह — उपमेय को निगलकर उपमान के साथ अभिन्नता प्रदर्शित करना (जहाँ बहुत बढ़ा-चढ़ाकर लोक से बाहर की बात कही जाये) ही अतिशयोक्ति अलंकार के लक्षण हैं।

अतिशयोक्ति अलंकार के उदाहरण—

छाले परिबे कै डरनु, सकै न हाथ छुबाइ।
झझखत हियैं गुलाब कैं, झँवा झवैयत पाइ।।

स्पष्टीकरण— उपर्युक्त उदाहरण में नायिका के पाँवों की सुकुमारता का बहतु बढ़ा-चढ़ाकर वर्णन किया गया है। अत: यहां अतिशयोक्ति अलंकार है।

—:अथवा:—

यह चन्द्र है।

स्पष्टीकरण— प्रस्तुत उदहारण उपमेय को निकलकर उपमान के साथ अभिन्ननता प्रदर्शित की गई है। अत: यहाँ अतिशयोक्ति अलंकार है।


अनन्वय अलंकार

अनन्वय अलंकार की परिभाषा— उपमान के अभाव के कारण उपमेय ही उपमान का स्थान ले लेता है, वहाँ अनन्वय अलंकार होता है।

अनन्वय अलंकार के लक्षण— एक ही वस्तु को उपमेय व उपमान दोनों कहना (जब उपमेय की समता देने के लिए कोई उपमान नहीं होता और कहा जाता है उसके समान वही है।) ही अनन्वय अलंकार के लक्षण है।

अनन्वय अलंकार के उदाहरण—

राम-से राम, सिया-सी सिया;
सिरमौर बिरंचि बिचारि सँवारे।

स्पष्टीकरण— उपर्युक्त उदाहरण में राम और सीता ही उपमान है तथा राम और सीता ही उपमेय है। अत: यहां अनन्वय अलंकार है।


प्रमुख अंलकार-युग्मों में अन्तर

यमक और श्लेष अलंकार में अन्तर—

यमक अलंकारश्लेष अलंकार
यमक में एक शब्द एक से अधिक बार प्रयुक्त होता है और प्रत्येक स्थान पर उसका अलग अर्थ होता है।श्लेष में एक शब्द के एक बार प्रयुक्त होने पर भी अनेक अर्थ होते हैं।
जैसे-नगन जड़ाती थी वे नगन जड़ाती हैं।को घटि ये वृषाभानुजा व हलधर के वीर।
स्पष्टीकरण—यहाँ दोनों स्थान पर नगन शब्द के अलग-अलग अर्थ हैं— नग (रत्न) और नग्न (वस्त्रहीन)।स्पष्टीकरण— यहाँ वृषभानुजा के अर्थ हैं— वृषभानु + जा अर्थात् वृषभानु की पुत्री राधा तथा वृषभ + अनुजा अर्थात् वृषभ की बहन गाय। हलधर के अर्थ हैं— हल को धारण करने वाला बलराम तथा बैल।

उपमा और उत्प्रेक्षा अलंकार में अन्तर—

उपमा अलंकार—उत्प्रेक्षा अलंकार—
उपमा में उपमेय की उपमान से समानता बताई जाती है।उत्प्रेक्षा में उपमेय में उपमान की सम्भावना प्रकट की जाती है।
जैसे-पीपर पात सरिस मन डोला।सोहत ओढ़ै पीटु पटु, स्याम सलोने गात।
मनौ नीलमनणि-सैल पर, आतपु परयौ प्रभात।।
स्पष्टीकरण—यहाँ मन की तुलना पीपल के पत्ते से की गई है।यहाँ पर पीटु पटु में प्रभात की धूप की तथा श्रीकृष्ण के सलोने शरीर में नीलमणि के पर्वत की सम्भावना की गई है।

उपमा और रूपक अलंकार में अन्तर—

उपमा अलंकार—रूपक अलंकार—
उपमा में उपमेय की उपमान से समानता बताई जाती है।रुपक में उपमेय में उपमान का भेदरहित आरोप किया जाता है।
जैसे-पीपर पात सरिस मन डोला।चरन-कमल बंदौ हरिराई।
स्पष्टीकरण—यहाँ मन की तुलना पीपल के पत्ते से की गई है।स्पष्टीकरण— यहाँ पर चरणों पर कमल का भेदरहित आरोप किया गया है।

सन्देह और भ्रान्तिमान अलंकार में अन्तर—

सन्देह अलंकार—भ्रान्तिमान अलंकार—
सन्देह में उपमेय में उपमान का सन्देह रहता है।भ्रान्तिमान में उपमेय का ज्ञान नहीं रहता और भ्रमवश एक को दूसरा ही समझ लिया जाता है।
जैसे-रस्सी है या साँप।रस्सी नहीं, साँप है।
स्पष्टीकरण—भ्रान्तिमान में भ्रम निश्चय में बदल जाता है।उपर्यक्त उदाहरणों, जैसे- सन्देह में निरन्तर सन्देह बना रहता है और निश्चय नहीं हो पाता है, किन्तु भ्रान्तिमान में भ्रम निश्चय में बदल जाता है।

आधुनिक/पाश्चात्य अंलकार—

आधुनिक काल में पाश्चात्य साहित्य से आए अलंकारों को ही आधुनिक / पाश्चात्य अलंकार कहते हैं।

आधुनिक / पाश्चात्य अलंकार के भेद— आधुनिक या पाश्चात्य अलंकारों को मुख्य रूप से तीन भागों में विभाजित किया गया है—

(क). मानवीकरण अलंकार
(ख). ध्वन्यर्थ अलंकार
(ग). विशेषण-विपर्यय अलंकार


(क). मानवीकरण अलंकार की परिभाषा— जहाँ अमानव (प्रकृति, पशु-पक्षी व निर्जीव पदार्थ) में मानवीय गुणों का आरोपण हो, वहाँ मानवीकरण अलंकार होता है।

मानवीकरण अलंकार के लक्षण या पहचान चिन्ह— अमानव में मानवीय गुणों का आरोपण ही मानवीकरण अलंकार के लक्षण या पहचान है।

मानवीकरण अलंकार के उदाहरण—

जगीं वनस्पतियाँ अलसाई, मुख
धोती शीतल जल से।

स्पष्टीकरण— उपर्युक्त उदाहरण में अमानव में मानवीय गुणों का आरोपण किया गया है; अत: यहाँ मानवीकरण अलंकार है।

(ख). ध्वन्यर्थ व्यंजना अलंकार की परिभाषा— जहाँ ऐसे शब्दों का प्रयोग हो जिनसे वर्णित वस्तु प्रसंग का ध्वनि-चित्र अंकित हो जाय, वहाँ ध्वन्यर्थ व्यंजना अलंकार होता है।

ध्वन्यर्थ व्यंजना अलंकार के लक्षण या पहचान चिन्ह— ऐसे शब्दों का प्रयोग जिनसे वर्णित वस्तु प्रसंग का ध्वनि-चित्र अंकित हो जाए अथवा हो जाता है वही ध्वन्यर्थ व्यंजना अलंकार की पहचान होता है।

ध्वन्यर्थ व्यंजना अलंकार के उदाहरण— चरमर-चरमर-चूँ-चरर-मरर जा रही चली भैंसा गाड़ी।

स्पष्टीकरण— प्रस्तुत उदाहरण में ऐसे शब्दों का प्रयोग हुआ है जिनसे वर्णित वस्तु प्रसंग का ध्वनि-चित्र अंकित हो रहा है अत: यहाँ ध्वन्यर्थ व्यंजना अलंकार है।

(ग). विशेषण-विपर्यय अलंकार की परिभाषा— जहाँ विशेषण का विपर्यय कर दिया जाता है अर्थात् स्थान बदल दिया जाता है वहाँ विशेषण-विपर्यय अलंकार होता है।

विशेषण-विपर्यय अलंकार के लक्षण या पहचान चिन्ह— विशेषण का विपर्यय कर देना अथवा स्थान बदल देना ही विशेषण-विपर्यय अलंकार के पहचान चिन्ह हैं।

विशेषण-विपर्यय अलंकार के उदाहरण—

इस करुणाकलित हृदय में,
अब विकल रागिनी बजती है।

स्पष्टीकरण— यहाँ विकल विशेषण रागिनी के साथ लगाया गया है जबकि कवि का हृदय विकल हो सकता है रागिनी नहीं।

अलंकार – अलंकार की परिभाषा, भेद, उदाहरण, स्पष्टीकरण अत्यन्त आसान एवं सरल शब्दों में— अगर आपको यह पोस्ट पसंद आया हो तो आप कृपया करके इसे अपने दोस्तों के साथ जरूर शेयर करें। अगर आपका कोई सवाल या सुझाव है तो आप नीचे दिए गए Comment Box में जरुर लिखे ।

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