आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का जीवन परिचय – Aachaary Hazari Prasad Dwivedi Biography in Hindi

आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी – डॉ० हजारीप्रसाद द्विवेदी हिन्दी साहित्य के अति सम्माननीय साहित्यकार है | उनके निबन्धों में जीवन – दर्शन , ऐतिहासिक दृष्टि तथा आदर्श साहित्य की त्रिवेणी प्रवाहित हो रही है | निबन्ध उनकी प्रतिभा के परिचायक है | भारतीय साहित्य, संस्कृति तथा दर्शन के कुशल ज्ञाता, महान विचारक और कुशल वक्ता थे | उन्होंने हिन्दी की ललित निबन्ध परम्परा को अत्यन्त समृध्दिशाली बनाया तथा हिंदी समीक्षा को एक नयी उदार और मनोवैज्ञानिक द्रृष्टि प्रदान की |

आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का जीवन परिचय

आचार्य द्विवेदी का व्यक्तित्व बहुमुखी है | वे हिन्दी साहित्य के प्रख्यात कृति है | इतिहास – लेखक के रूप में हिन्दी साहित्य में पदार्पण करने के बाद एक सफल आलोचक, विख्यात निबन्धकार, उपन्यासकार और सफल वक्ता तथा अध्यापक के रूप में लोकप्रियता अर्जित करते रहे है | आज का कोई अन्य गद्यकार इतने धरातल पर साहित्य – सृजन नहीं कर रहा है | हिन्दी के उच्चस्तरीय ललित निबन्धकारो में आचार्य हजारीप्रसाद का द्विवेदी का मूर्धन्य स्थान है |

आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का जीवन परिचय – Aachaary Hazari Prasad Dwivedi Biography in Hindi

नामहजारीप्रसाद द्विवेदी
जन्मसन् 1907 ई०
जन्म – स्थानदुबे का छपरा
मृत्यु19 मई , 1979 ई०
मृत्यु – स्थानदिल्ली
पिता का नामपं० अनमोल द्विवेदी
माता का नामज्योतिकली देवी

प्रस्तावना—

भारत की भूमि पर अनेक साहित्यकारों का जन्म हुआ | उन साहित्यकारों में आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी जी एक है | इनकी गणना भारत के महान साहित्यकारो में की जाती है | इन्होने हिंदी साहित्य की महान सेवा है | इनकी रचनाये साहित्य जगत में अमूल्य निधि के रूप में स्वीकार की जाती है | द्विवेदी जी बचपन से ही कुशाग्र बुध्दि के थे | इनका पारिवारिक जीवन सुखी एवं संपन्न था | अपनी पारिवारिक परम्परा के अनुरूप ही उन्होंने भी संस्कृत का अध्ययन आरम्भ किया

क्योकि संस्कृत के प्रति अटूट अनुराग उन्हें पितृ एवं मातृ कुल से संस्कार – रूप में प्राप्त हुआ था तथा ज्योतिष की शिक्षा भी बालक हजारीप्रसाद को उत्ताराधिकार में ही प्राप्त हुआ था | द्विवेदी जी आजीवन साहित्य – साधना में लीन रहे | आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी जी हिन्दी के श्रेष्ठ निबन्धकार, उपन्यासकार, आलोचक एवं भारतीय संस्कृत के युगीन व्याख्यता के रूप में साहित्य जगत में विख्यात है | द्विवेदी जी का नाम हिन्दी साहित्य – जगत में स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाता है |

जन्म – स्थान—

हिन्दी के श्रेष्ठ निबन्धकार, उपन्यासकार, आलोचक एवं भारतीय संस्कृति के युगीन व्याख्याता आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का जन्म सन् 1907 ई० को उत्तर प्रदेश में बलिया जिले के दुबे का छपरा नामक गाँव के एक प्रतिष्ठित सरयूपारीण बाह्मण – कुल में हुआ था |

माता – पिता—

द्विवेदी जी के पिताश्री का नाम पं० अनमोल द्विवेदी था | इनके पिता पं० अनमोल द्विवेदी संस्कृत और ज्योतिष के प्रकाण्ड विध्दान थे | तथा उनकी माता श्रीमती ज्योतिकली देवी धर्मपरायण महिला थी |

शिक्षा—

हजारीप्रसाद द्विवेदी जी ने प्रारम्भिक शिक्षा बलिया के मिडिल स्कूल से प्राप्त कर बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से ज्योतिषाचार्य तथा इण्टर की परीक्षाए उत्तीर्ण की | आगे की शिक्षा भी काशी के हिन्दू विश्वविद्यालय में ही हुई जहाँ से द्विवेदी जी ने ज्योतिष शास्त्र में शास्त्राचार्य की उपाधि प्राप्त की | हजारीप्रसाद द्विवेदी जी को संस्कृत और ज्योतिष की शिक्षा अपने माता – पिता से विरासत में मिली थी | द्विवेदी जी को अनेक विषयों का ज्ञान था | इन्होने हिन्दी एवं संस्कृत भाषाओ का गहन अध्ययन किया |

आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी जी द्वारा किये गये महत्वपूर्ण कार्य—

द्विवेदी जी अपने जीवन में अनेक महत्वपूर्ण पदों पर कार्यरत रहे | शिक्षा प्राप्त करने के बाद सन् 1930 ई० में वे शान्ति निकेतन में हिंदी और संस्कृत के प्राध्यापक नियुक्त हुए | कुछ समय पश्चात् सन् 1950 में ये काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के प्रोफेसर और अध्यक्ष नियुक्त हुए | शान्ति निकेतन, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय एवं पंजाब विश्वविद्यालय जैसी संस्थाओं के ये हिन्दी विभाग के अध्यक्ष रहे |

सन् 1958 में ये राष्ट्रीय ग्रन्थ न्यास के सदस्य बने | ये कई वर्षो तक काशी नागरी प्रचारिणी सभा के उपसभापति , खोज विभाग के निर्देशक तथा नागरी प्रचारिणी पत्रिका के सम्पादक रहे | इसके बाद सन् 1960 से 1966 तक ये पंजाब विश्वविद्यालय, चण्डीगढ़ में हिन्दी विभाग के प्रोफेसर और अध्यक्ष रहे | इसके पश्चात् इन्होने भारत सरकार की हिन्दी सम्बन्धी विविध योजनाओं का दायित्व ग्रहण किया | और अन्तिम समय तक इसका निर्वाह करते रहे |

आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी जी को प्राप्त उपाधि एवं सम्मान व पुरस्कार—

आपकी साहित्यिक सेवाओं के उपलक्ष्य में सन् 1940 ई० में लखनऊ विश्वविद्यालय ने आपको डी०लिट० के मानद् उपाधि से सम्मानित किया | सन् 1957 ई० में भारत सरकार द्वारा उन्हें पदमभूषण की उपाधि से विभूषित किया गया | तथा कबीर नामक कृति पर आपको मंगलाप्रसाद पारितोषिक प्राप्त हुआ | साहित्य समिति इन्दौर ने उन्हें सूर -साहित्य पर स्वर्ण पदक प्रदान कर सम्मानित किया था | इस प्रकार द्विवेदी जी ने अपने जीवन में अनेक ख्याति प्राप्त की थी |

मृत्यु – स्थान—

सेवा – निवृत्त होने के पश्चात् भी वे निरन्तर साहित्य – सेवा में जुटे रहे | 19 मई , 1979 ई० को दिल्ली में हिन्दी साहित्य का यह देदीप्यमान नक्षत्र सदैव के लिए अस्त हो गया |

साहित्यिक – परिचय—

द्विवेदी जी की साहित्यिक कृतियों को देखते हुए उन्हें हम उच्च कोटि का अनुसंधाता , आलोचक, निबंध लेखक और विचारक कह सकते है | आधुनिक युग के गद्यकारो में आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का महत्वपूर्ण स्थान है | हिन्दी गद्य के क्षेत्र में इनकी साहित्यिक सेवाओं का आकलन निम्नलिखित प्रकार से किया जा सकता है |

(1) निबन्धकार के रूप में — आचार्य द्विवेदी के निबंधो में जहाँ साहित्य और संस्कृति की अखण्ड धारा प्रवाहित है वही नित्यप्रति के जीवन की विविध गतिविधियों, क्रिया – व्यापारों, अनुभूतियो आदि का चित्रण भी अत्यन्त सजीवता और मार्मिकता के साथ हुआ है |

(2) आलोचक के रूप में — आलोचानात्मक साहित्य के सृजन की दृष्टि से द्विवेदी जी महत्वपूर्ण स्थान है | उनकी आलोचनात्मक कृतियों में विव्दत्ता और अध्ययनशीलता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है |

(3) उपन्यासकार के रूप में — द्विवेदी जी ने चार महत्वपूर्ण उपन्यासों की रचना की है | ये है ‘बाणभट्ठ की आत्मकथा’, ‘चारु-चन्द्र-लेख’, ‘पुनर्नवा’, और ‘अनामदास का पोथा’ | सांस्कृतिक पृष्ठभूमि पर आधारित ये उपन्यास द्विवेदी जी की गम्भीर विचार – शक्ति के प्रमाण है | इतिहास और कल्पना के समन्वय द्वारा लेखक ने अपने उपन्यास – साहित्य को आकर्षक रूप प्रदान किया है |

(4) ललित निबन्धकार के रूप में — द्विवेदी जी ने ललित निबन्ध के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण लेखन – कार्य किया है | हिंदी के ललित निबन्ध को व्यवस्थित रूप प्रदान करने वाले निबंधकार के रूप में आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी जी अग्रणीय है | द्विवेदी जी के ललित निबन्धों में रसास्वादन की अपूर्व क्षमता विद्यमान है | उनमे भावुकता, सरसता और कोमलता के साथ – साथ आवेगपूर्ण प्रतिपादन की शैली विद्यमान है | निश्चय ही ललित निबन्ध के क्षेत्र में वे युग – पवर्तक लेखक रहे है |

डा० विद्यानिवास मिश्र ने इनके निबन्धों की विशेषता बताते हुए लिखा है कि “द्विवेदी जी बहुश्रुत है और कथाकौतुकी भी | उनके निबन्धों का सबसे मुख्य गुण है किसी एक विषय को लेकर अनेक विचारों को छेड़ देना – जिस प्रकार वीणा के एकतार को छेड़ने से बाकी सब तार झंकृत हो उठते है, उसी प्रकार उस एक विषय को छूते ही लेखक चित्र – भूमि पर बंधे हुए सैकड़ो विचार बज उठते है |”

द्विवेदी जी के निबन्ध अनेक विधाओं के ज्ञान – भण्डार है | उनमे इतिहास, पुरातत्व, ज्योतिष, दर्शन और शास्त्रों का सुगम सार – संग्रह है | ज्ञान – गरिमा के साथ लालित्य का इन्होने अद्भुत योग किया है |

कृतियाँ

आचार्य द्विवेदी जी का साहित्य बहुत विस्तृत है | कविता और नाटक के क्षेत्र में इन्होने प्रवेश नहीं किया | द्विवेदी जी ने अनेक ग्रंथो की रचना की जिनको निम्नलिखित वर्गों में प्रस्तुत किया जा सकता है |

(1) निबन्ध – संग्रह:— अशोक के फूल , कुटज, विचार- प्रवाह, विचार और वितर्क, अलोक पर्व, कल्पलता |

(2) आलोचना:— साहित्य सूर -साहित्य, कालिदास की लालित्य योजना, कबीर, साहित्य – सहचर, साहित्य का मर्म |

(3) इतिहास हिंदी:— साहित्य की भूमिका, हिंदी – साहित्य, हिन्दी – साहित्य का आदिकाल आदि |

(4) उपन्यास:— बाणभट्ट की आत्मकथा, चारु- चन्द्र- लेख, पुनर्नवा अनामदास का पोथा |

(5) सम्पादन:— नाथ – सिध्दों की बनियाँ, संक्षित पृथ्वीराज रासो, सन्देश – शासक |

(6) अनुदित रचनाए:— प्रबन्ध चिन्तामणि, पुरातन- प्रबंध – संग्रह, प्रबन्ध कोष, विश्व- परिचय, लाल कनेर, मेरा बचपन आदि |

भाषा

द्विवेदी जी की भाषा शुद्ध, प्रौढ़ तथा पारिमार्जित खड़ीबोली है इसमे अग्रेजी, उर्दू,फारसी के अत्याधिक प्रचलित शब्दों का प्रयोग किया गया है | उनकी भाषा में मुहावरों का प्रयोग बहुत कम है | इनकी भाषा उच्च कोटि की है |

शैली

शैली की दृष्टि से द्विवेदी जी का काव्य उच्चकोटि का है | उनकी गद्य – शैली अति प्रौढ़ एवं गम्भीर है | शैली के तो वे निर्माता थे | उनकी रचनाओ में शैली के निम्न रूप देखने को मिलता है विवेचनात्मक शैली, गवेषणात्मक शैली, आलोचनात्मक शैली, भावात्मक शैली, आत्मपरक शैली | इनके अतिरिक्त इनकी रचनाओ में अनेक शैलियों का चमत्कार पूर्ण प्रयोग भी देखा जा सकता है | जैसे चिन्तनपरक गम्भीर शैली, विक्षेप शैली, तरंग शैली, उध्दरण शैली, विवरणात्मक शैली, इतिवृत्तात्मक शैली आदि |

हिन्दी – साहित्य में स्थान

डाॅ० हजारीप्रसाद द्विवेदी की कृतियाँ हिंदी साहित्य की शाश्वत निधि है | आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी जितनी ऊँचाई के गरिम – गंभीर पंडित थे , उतनी है उत्कृष्टता के रम्य – ललित रचना कार भी और जितने ही श्रेष्ठ – अथक अतलान्तक शोधक थे , उतने ही महनीय – विशद – उदार मानवतवादी भी | आचार्य द्विवेदी के निबंध बहुज्ञता के श्रेष्ठ निदर्शन है | साहित्य , संस्कृति , कला, रूप , राग और लोक – तत्व की चर्चा आचार्य द्विवेदी का उल्लेख किये बिना अधूरी ही रहती है |

हिन्दी साहित्य में आचार्य द्विवेदी का नाम लालित्य के उन्मेषक और प्रतिष्ठापरक रचनाकार के रूप में लिया जाता है | उनके निबन्धों एवं आलोचनाओ में उच्चकोटि की विचारात्मक क्षमता के दर्शन होते है | हिन्दी – साहित्य – जगत में उन्हें एक विध्दान, समालोचक, निबन्धकार एवं आत्मकथा – लेखक के रूप में ख्याति प्राप्त है | वस्तुतः वे एक महान साहित्यकार थे | आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी जी को आधुनिक युग के गद्यकारो में विशिष्ट स्थान प्राप्त है | आधुनिक युग के साहित्यकारों में हजारीप्रसाद द्विवेदी जी का नाम सदैव स्मरणीय रहेगा |

“आजीवन साहित्य – सेवा के कार्यो को सफलता पूर्वक सम्पन्न करता हुआ, यह महान तपस्वी, हिन्दी साहित्य – जगत में सदैव के लिए अमर हो गया |”

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