सुमित्रानन्दन पन्त का जीवन- परिचय – Sumitranandan Pant Biography in Hindi

सुमित्रानन्दन पन्तः- प्रकृति के चतुर चितेरे एवं कोमल कल्पना के कौशेय कवि सुमित्रानन्दन पन्त छायावाद के प्रतिनिधि कवि हैं। छायावादी कवि-चतुष्टयी में पन्त जी का प्रमुख स्थान है। सन् 1950 ई० में पन्त जी को ऑल इण्डिया रेडियो के परामर्शदाता पद पर नियुक्त होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ और सन् 1957 ई० तक वे प्रत्यक्ष रूप से रेडियो से सम्बद्ध रहे। पन्त जी मूलतः प्रेम और सौन्दर्य के कवि हैं।

हिन्दी-साहित्य-जगत में छायावाद फलता-फूलता और विकसित होता रहे। यही पन्त जी की आत्मिक अभिलाषा थी। हिन्दी-साहित्य में छायावाद जब अन्तप्राय हो रहा था, तो ऐसे विषमकाल में अपनी कालजयी अद्भुत रचनाओं के माध्यम से कवि पन्त ने छायावाद की नव प्राण-प्रतिष्ठा की।

सुमित्रानन्दन पन्त
सुमित्रानन्दन पन्त का जीवन- परिचय

इसलिए निःसन्देह हम पन्त जी को छायावाद के प्राणप्रतिष्ठापकों में श्रेष्ठ-शिरोमणि कह सकते हैं। ये काव्य जगत में कोमल भावनाओं और प्रकृति के सुकुमार कवि के रूप में प्रसिद्ध हैं। इस दृष्टि से पन्त जी का हिन्दी साहित्य में सर्वोपरि स्थान है।

प्रास्तावनाः-

भारत की भूमि पर जन्में श्री समित्रानन्दन पन्त जी का प्रवेश हिन्दी साहित्य जगत में कवि और साहित्यकार के रूप में हुआ था। पन्त जी बचपन से ही कुशाग्रबुद्धि के थे। बचपन से ही इन्हें अनेक कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा । यह एक दुःखद और कारुणिक दुर्योग था कि पन्त के जन्म के मात्र छः घण्टे पश्चात् ही शिशु पर से माँ की ममतालु छाया उठ गयी।

“नियति ने ही निज कुटिल कर से सुखद,
गोद मेरे लाड़ की थी छीन ली,
बाल्य ही में हो गयी थी लुप्त हा!
मात-अंचल की अभय छाया मुझे।”

नियति-नदी की त्रासद बांहों ने पन्त के सिर से माँ की छाया भौतिक रूप से तो हटा दी पर भाव-रूप से वह ऐसा कर पाने में सर्वथा असफल रही। कौसानी के सम्पूर्ण परिवेश में पन्त को सदैव माँ की ममता और उसका प्रेम प्राप्त होता रहा।

माँ से बढ़कर रही धात्रि, तू बचपन में मेरे हित।
धात्रि-कथा-रूपक भर तूने किया जनकबन पोषण
मातृहीन बालक के सिर पर वरदहस्त धर गोपन।

पन्त जी अपने माता-पिता की कनिष्ठतम (सबसे छोटी) सन्तान थे। पिता तथा दादी के वात्सल्य की छाया में इनका प्रारम्भिक लालन-पालन हुआ। पन्त जी के परिवार में उनसे तीन बड़े भाई और चार बड़ी बहने थे। पन्त जी का बाल्यकाल भाइयों-बहनों और भाभियों के सन्निध्य में व्यतीत हुआ। आर्थिक संघर्षों और पिता तथा भाई की मृत्यु ने संवेदनशील पन्त जी को इतना प्रभावित किया कि उनका सृजनात्मक कार्य रूप-सा गया। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर जी ने पन्त जी को अप्सरा लोक का कवि कहा है।

जन्म-स्थानः-

छायावादी वृहत्रयी के कौशेय कवि, सौन्दर्यावतार कवि श्री समित्रानन्दन पन्त जी का जन्म मई 20, 1900 ई० (संवत् 1957 वि०) को प्रकृति की सुरम्य क्रीड़ा स्थली कूर्मांचल प्रदेश के अन्तर्गत अल्मोड़ा जिले के कौसानी नामक गाँव में हुआ था।

पिताः-

पन्त जी के पिता का नाम पं गंगादत्त पन्त था। पिता पं. गंगादत्त पन्त कौसानी में चाय-बागान के मैनेजर और एकाउण्टैण्ट थे। वे लकड़ी और कपड़े का व्यापार भी करते थे।

माताः-

प्रकृति के सुसुमार कवि पं. श्री समित्रानन्दन पन्त जी की माता का नाम श्रीमती सरस्वती देवी था।

सुमित्रानन्दन पन्त जी के बाल्यकाल का नामः-

पन्त जी के बचपन का मूल नाम गोसाईदत्त पन्त था। बाद में उन्होंने अपना नाम गोसाईदत्त से बदलकर सुमित्रानन्दन पन्त रखा।

शिक्षाः-

सन् 1905 में पाँच वर्ष के बालक पन्त ने विद्यारम्भ किया। पिता जी ने लकड़ी की पट्टी पर श्रीगणेशाय नमः लिखकर सरस्वती के वरद पुत्र को स्वर-व्यंजन वर्ण लिखना सिखाया। पन्त जी का प्रथम विद्यालय होने का श्रेय प्राप्त हुआ- उनके गाँव कौसानी की पाठशाला कौसानी वनार्क्यूलर स्कूल को। पन्त के फूफाजी ने उन्हें संस्कृत की शिक्षा दी तथा 1909 तक मेघदूत, अमरकोश, रामरक्षा-स्रोत, चाणक्य नीति, अभिज्ञान-शाकुन्तलम् आदि का ज्ञान पन्त जी को करवा दिया ।

पन्तजी के पिताजी ने उन्हें स्वयं घर पर ही अंग्रेजी की शिक्षा प्रदान दी। इसके पश्चात् ये अल्मोड़ा के गवर्नमेण्ट हाईस्कूल में प्रविष्ट हुए। तत्पश्चात् काशी के जयनारायण हाईस्कूल, बनारस से हाईस्कूल की परीक्षा द्वितीय श्रेणी में उत्तीर्ण की। हाईस्कूल के बाद पन्त जी ने आगे की शिक्षा हेतु प्रयाग के म्योर कॉलेज में प्रवेश प्राप्त किया। तीर्थराज प्रयाग पन्त जी की साहित्य-साधना का केन्द्र बना।

बाद में कालेज और परीक्षा के कठोर नियंत्रण से मुक्त होकर पन्त जी स्वाध्याय में निरत हुए और स्वयं ही अपने आप को शिक्षित करना प्रारम्भ किया। पन्त जी का लगाव संगीत से भी था। उन्होंने सारंगी, हारमोनियम, इसराज तथा तबला पर संगीत का अभ्यास भी किया और सुरुचिपूर्ण रहन-सहन तथा आकर्षक वेशभूषा से उधर झुकते भी गये।

श्री सुमित्रानन्दन पन्त जी द्वारा किये गये महत्वपूर्ण कार्यः-

सन् 1921 ई० में महात्मा गाँधी के आह्वान पर कॉलेज छोड़ दिया। सन् 1921 में गाँधी और गाँधी-विचार-दर्शन ने उन्हें इतना प्रभावित किया कि वे पढ़ाई छोड़कर असहयोग आन्दोलन में सम्मिलित हो गये। किन्तु अपने कोमल स्वभाव के कारण सत्याग्रह में सम्मिलित न रह सके और पुनः साहित्य-साधना में संलग्न हो गये।
सन् 1950 में पन्त जी आकाशवाणी से जुड़े और वहाँ चीफ प्रोड्यूसर के पद पर सन् 1957 तक कार्यरत् रहे। सन् 1958 में आकाशवाणी में ही हिन्दी परामर्शदाता के रूप में रहे। तथा सोवियत-भारत-मैत्री-संघ के निमन्त्रण पर पन्त जी ने सन् 1961 में रूस तथा अन्य यूरोपीय देशों की यात्रा की।

पं. श्री सुमित्रानन्दन पन्त जी को प्रकृति का सुकुमार कवि क्यों कहा जाता हैः-

प्रकृति आदर्श शिक्षिका-संरक्षिका होती है। प्रकृति की गोद में माँ की ममता और पिता का प्रेम एक साथ प्राप्त होता है।

कवि ने स्वयं लिखा है— “ मेरी प्रारम्भिक रचनाएँ प्रकृति की ही लीला – भूमि में लिखी गयी है। ” श्री सुमित्रानन्दन पन्त जी के काव्य में कल्पना एवं भावों की सुकुमार कोमलता के दर्शन होते हैं। इन्होंने प्रकृति एवं मानवीय भावों के चित्रण में विकृत तथा कठोर भावों को स्थान नहीं दिया है। इनकी छायावादी कविताएँ अत्यन्त कोमल एवं मृदुल भावों को अभिव्यक्ति करती हैं। इन्हीं कारणों से पन्त जी को प्रकृति का सुकुमार कवि कहा जाता है।

श्री सुमित्रानन्दन पन्त जी को प्राप्त मान-सम्मान व पुरस्कारः-

  1. सन् 1960 ई० में हिन्दी-साहित्यकारों ने अज्ञेय द्वारा सम्पादित मानग्रन्थ- रूपाम्बरा, राष्ट्रपित-भवन में तत्कलीन राष्ट्रपति डॉ० राजेन्द्र प्रसाद ने पन्त जी को दिया था। पन्त जी की षष्टि पूर्ति पर दिया गया रूपाम्बरा जैसा मानग्रन्थ अभी तक शायद ही किसी अन्य को प्राप्त हुआ हो।
  2. भारत सरकार द्वारा उनकी साहित्यिक-कलात्मक उपलब्धियों हेतु पदम-भूषण सम्मान सन् 1961 में प्रदान किया गया।
  3. कला और बूढ़ा चाँद पर सन् 1961 में ही साहित्यिक अकादमी का पाँच हजार रुपये का अकादमी पुरस्कार मिला।
  4. लोकायतन महाकाव्य पर नवम्बर, 1965 में प्रथम सोवियत लैण्ड नेहरू पुरस्कार प्राप्त हुआ।
  5. सन् 1965 में ही उत्तर प्रदेश सरकार का विशिष्ट साहित्यिक सेवा हेतु दस हजार रुपये का पुरस्कार मिला।
  6. पन्त जी को सन् 1967 ई० में विक्रम विश्वविद्यालय द्वारा डी० लिट० की मानद उपाधि से विभूषित किया।
  7. पन्त जी को सन् 1968 में चिदम्बरा पर भारतीय ज्ञान-पीठ का एक लाख रुपये का पुरस्कार प्राप्त हुआ था।

मृत्यु-स्थानः-

पन्त जी आजीवन सृजन-कर्म में निरत-निलीन रहे। सरस्वती के इस पुजारी, ने इलाहाबाद की भूमि पर 77 वर्ष की आयु में, 28 दिसम्बर, 1977 ई० को अपने मधुरिम गान को भू पर छोड़कर स्वर्णिम पखेरु उड़ गये।

साहित्यिक-परिचयः-

पन्त जी का बाल्यकाल कौसानी के सुरम्य वातावरण में व्यतीत हुआ। इस कारण प्रकृति ही उनकी जीवन-सहचरी के रूप में रही और काव्य-साधना भी प्रकृति के बीच रहकर ही की। अतः प्रकृति वर्णन, सौन्दर्य प्रेम और सुकुमार कल्पनाएँ उनके काव्य में प्रमुख रूप से पायी जाती हैं। प्रकृति-वर्णन की दृष्टि से पन्त जी हिन्दी के वर्ड्सवर्थ माने जाते हैं। छायावादी युग के ख्याति प्राप्त कवि सुमित्रानन्दन पन्त सात वर्ष की अल्पायु से कविताओं की रचना करने लगे थे।

उनकी प्रथम रचना सन् 1916 ई० में सामने आयी। गिरजे का घण्टा नामक इस रचना के पश्चात् वे निरन्तर काव्य साधना में तल्लीन रहे। पन्त जी के साहित्य पर कवीन्द्र रवीन्द्र, स्वामी विवेकानन्द का और अरविन्द दर्शन का भी पर्याप्त प्रभाव पड़ा है। इसलिए उनकी बाद की रचनाओं में अध्यात्मवाद और मानवतावाद के दर्शन होते है। उनकी कल्पना ऊँची, भावना कोमल और अभिव्यक्ति प्रभावपूर्ण है। अन्त में पन्त जी प्रगतिवादी काव्यधारा की ओर उन्मुख होकर दलितों और शोषितों की लोक क्रांति के अग्रदूत बने। पन्तजी ने साम्यवाद के समान ही गाँधीवाद का भी स्पष्ट रूप से समर्थन करते हुए लिखा है—

मनुष्यत्व का तत्व सिखाता निश्चित हमको गाँधीवाद,
सामूहिक जीवन विकास की साम्य योजना है अविवाद।

कृतियाँ:-

पन्त जी बहुमुखी प्रतिभा-सम्पन्न साहित्यकार थे। अपने विस्तृत साहित्यिक जीवन में उन्होंने विविध विधाओं में साहित्य रचना की। उनकी प्रमुख कृतियों का विवरण इस प्रकार है—

लोकायतन (महाकाव्य)- पन्त जी का लोकायतन महाकाव्य लोक जीवन का महाकाव्य है। यह महाकाव्य सन् 1964 में प्रकाशित हुआ। इस महाकाव्य में कवि की सांस्कृतिक और दार्शनिक विचारधारा व्यक्त हुई है। इस रचना में कवि ने ग्राम्य-जीवन और जन-भावना को छन्दोबद्ध किया है।

वीणाः- इस रचना में पन्त जी के प्रारम्भिक प्रकृति के अलौकिक सौन्दर्य से पूर्ण गीत संगृहीत हैं।

पल्लवः- इस संग्रह में प्रेम, प्रकृति और सौन्दर्य के व्यापक चित्र प्रस्तुत किये गये हैं।

ग्रन्थिः- इस काव्य-संग्रह में वियोग का स्वर प्रमुख रूप से मुखरित हुआ है। प्रकृति यहाँ भी कवि की सहचरी रही है।

गुंजनः- इसमें प्रकृति प्रेम और सौन्दर्य से सम्बन्धित गम्भीर एवं प्रौढ़ रचनाएं संकलित की गई हैं।

अन्य कृतियाँ :- स्वर्णधूलि, स्वर्ण-किरण, युगपथ, उत्तरा तथा अतिमा आदि में पन्तजी महर्षि अरविन्द के नवचेतनावाद से प्रभावित है। युगान्त, युगवाणी और ग्राम्या में कवि समाजवाद और भौतिक दर्शन की ओर उन्मुख हुआ है। इन रचनाओँ में कवि ने दीन-हीन और शोषित वर्ग को अपने काव्य का आधार बनाया है।

भाषाः-

पन्त जी की भाषा मूलतः अति सुकुमार और श्रुतिमधुर है। तथा पन्त जी की भाषा ही बड़ी चित्रमयी रही है और वह बड़े ही मनोरम बिम्बों की योजना करती है। इन्होंने खड़ीबोली को इतनी मृदुलता प्रदान की है कि लोग ब्रजभाषा की मिठास को भूल गये। ये भावानुरूप शब्दावली के प्रयोग में सिद्धहस्त है। चित्रात्मकता तो पन्त जी की कविता में अनायास ही बिम्बित हो उठती है। कवि को वर्णों की संगति की गहरी पकड़ है। पन्त जी की भाषा सामान्यतः संस्कृतिनिष्ठ और परिमार्जित है।

शैलीः-

पन्त जी की शैली में छायावादी काव्य-शैली की समस्त विशेषताएँ (लाक्षणिकता, प्रतीकात्मकता, ध्वन्यात्मकता, चित्रात्मकता आदि) प्रचुर मात्रा में मिलती है ।

साहित्य में स्थानः-

कविवर पन्त जी ने अपनी लेखनी से छायावाद ही नहीं प्रत्युत हिन्दी-साहित्य-जगत् को जो अविस्मरणीय रचनाएँ और शैली प्रदान की है, वह हिन्दी-साहित्य की अमूल्य निधि है। पन्त जी निर्विवाद रूप से एक सजग प्रतिभाशाली कलाकार थे। इनकी काव्य-साधना सतत् विकासोन्मुखी रही है। ये अपने काव्य के बाह्य और आन्तरिक दोनों पक्षों को सँवारने में सदैव सचेत रहे हैं। छायावाद के युग प्रवर्तक कवि के रूप में उन्हें अपार ख्याति प्राप्त हुई है।

उन्हें प्रकृति चित्रण एवं महर्षि अरविन्द के अध्यात्मिक दर्शन पर आधारित रचनाओ का श्रेष्ठ कवि माना जाता है। डॉ० हजारी प्रसाद द्विवेदी जी ने पन्त के काव्य का विवेचन करते हुए लिखा है कि “पन्त केवल शब्द शिल्पी ही नहीं, महान भाव-शिल्पी भी हैं। वे सौन्दर्य के निरन्तर निखरते सूक्ष्म रूप को वाणी देने और सम्पूर्ण युग को प्रेरणा देनेवाले प्रभाव-शिल्पी भी हैं।

और अन्ततः महाकवि रामधारी सिंह दिनकर के साथ हम भी कहना चाहते है कि — “मानवता के प्रणाम के अधिकारी वे होते है, जिन्होंने साधना की बड़ी से बड़ी कीमतें चुकाने में आनाकानी नहीं की हो। पन्त ने अपनी गृहस्थी नहीं बसायी, माखनलाल और निराला की गृहस्थी भगवान ने छीन ली और महादेवी ने अपनी गृहस्थी का कृष्णार्पण कर दिया और ये चारों कवि, इस युगवाले अध्याय में, महान ज्योतिष्पिण्डों की भाँति चमकते रहेंगे।

“पन्त जी निश्चित ही हिन्दी कविता के श्रृंगार हैं, जिन्हें पाकर माँ भारती कृतार्थ हुई है।”

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