चक्रवर्ती सम्राट बिन्दुसार का जीवन परिचय – Bindusara Biography in Hindi

चक्रवर्ती सम्राट बिन्दुसार- समय-समय पर इस धरती पर कुछ ऐसी महान-विभूतियाँ जन्म लेती हैं, जिनके विचारोँ से हम सभी का जीवन प्रकाशित होता है। ऐसी ही महान विभूतियों में चक्रवर्ती सम्राट बन्दुसार जी की गणना की जाती है। मौर्य वंश के दूसरे शासक के रूप में चक्रवर्ती सम्राट बिन्दुसार जी को शासन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।

भारत के एक बड़े भू-भाग पर सम्राट बिन्दुसार स्वयं शासन करते थे। वास्तव में सम्राट बिन्दुसार एक महान विजेता, कुशल शासक, कुशल प्रबंधक एवं प्रतापी राजा थे। सम्राट बिन्दुसार का आदर्श भारत के प्राचीन क्षत्रियों का परम्परागत आदर्श द्विग्विजय और भारत का राजनीतिक एकीकरण था।

चक्रवर्ती सम्राट बिन्दुसार का जीवन परिचय

आर्यमंजुश्री मूलकल्प में- सम्राट बिन्दुसार जी के गुणों की प्रशंसा करते हुए कहा गया है कि वह धृष्ट (साहसी) प्रगल्भ (वाकपटु) एवं प्रियवादी (मधुरभाषी) थे।

हमारे देश के महान सम्राट भारत के आकाश में देश-प्रेम, बलिदान एवं क्रान्ति के ऐसे नक्षत्र हैं, जो सदियों तक हमारा मार्गदर्शन करते रहेंगे” ऐसे ही महान सम्राटों में एक हैं – सम्राट बिन्दुसार

 

 

चक्रवर्ती सम्राट बिन्दुसार का जीवन परिचय – Bindusara Biography in Hindi

Table of Content

 

नाम बिन्दुसार
राज 298 – 272 ई० पू०
बिन्दुसार के अन्य नाम यामद्रसार,भद्रसार,सिंहसेन,बिन्दुपाल,अमित्रोचेइस,अलित्रोचेज या अलित्रोकेड्स
पुत्र अशोक , सुसीम
पिता का नाम चन्द्रगुप्त मौर्य
माता का नाम दुर्धरा,धम्मा ,सुभद्रांगी,सुभद्रा

चक्रवर्ती सम्राट बिन्दुसार का प्रारम्भिक जीवनः-

सम्राट बिन्दुसार की गणना भारत के महानतम शासकों में की जाती है। चक्रवर्ती सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य के बाद उसका पुत्र सम्राट बिन्दुसार राजा बना। सम्राट बिन्दुसार की महानता भारतीय इतिहास में मौर्य वंश के एक महान सेनानायक, सफल शासक, कुशल राजनीतिज्ञ, वीर योद्धा एवं प्रजापालक राजा थे। बचपन में ही माँ की मृत्यु हो जाने के कारण इन्हें अपने जीवन में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा । सम्राट बिन्दुसार जी बचपने से ही वीर, साहसी एवं कुशाग्रबुद्धि के थे।

अपने इन्हीं गुणों के कारण सम्राट बिन्दुसार अपने सभी भाइयों में सर्वश्रेष्ठ और शासन करने के योग्य समझे गये। सम्राट बिन्दुसार जी की प्रतिभा बहुमुखी थी। वे बड़े वीर, साहसी, पराक्रमी, बलवान, दयालु एवं प्रजापालक राजा था। भारत के इतिहास में ऐसे बहुत कम ही सम्रा हुए जिसमें एक साथ इतनी योग्ताएँ हों। इनका व्यक्तित्व साधारण में भी असाधारण था। चक्रवर्ती सम्राट बिन्दुसार जी की गिनती भारत के महान विजेताओँ और परम पराक्रमी सेनानायकों में की जाती है।

सम्राट बिन्दुसार के पिताः-

सम्राट बिन्दुसार जी के पिता मौर्य वंश के संस्थापक चक्रवर्ती सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य थे। इनके पिता एक महान विजेता एवं कुशल प्रशासक थे। भारत की राजनीतिक एकता का प्रयास करने वाले वे भारत के प्रथम सम्राट थे। इतना ही नहीं उसने भारतीय प्रदेशों से यूनानी शासकों को खदेड़ कर भारत के गौरव को बढ़ाया।

सम्राट बिन्दुसार की माताः-

सम्राट बिन्दुसार जी के माता के नाम के सम्बन्ध में विद्वानों में अनेक मतभेद है। जैन परम्परा के अनुसार सम्राट बिन्दुसार की माता का नाम दुर्धरा, महावंशटीका में धम्मा तथा अशोकावदान में उसे सुभद्रांगी नाम से उल्लिखित किया गया है। किन्तु सर्वमान्य मत सुभद्रा ही है।

सम्राट बिन्दुसार के अन्य नामः-

ब्राह्मण ग्रन्थ, जैन-परम्पराओं, बौद्ध साहित्य तथा विदेशी लेखकों ने इसे भिन्न-भिन्न नामों से उल्लिखित किया है। विष्णु पुराण में बिन्दुसार, वायुपुराण में यामद्रसार, ब्रह्माण्ड पुराण में भद्रसार, जैन ग्रन्थ राजावलिकथ में सिंहसेन, चीनी ग्रन्थ का-यू-एन-चू-लिन में इसे बिन्दुपाल, यूनानी लेखक एथेनिओस में अमित्रोचेइस तथा स्ट्रेबो ने अलित्रोचेज या अलित्रोकेड्स कहा है।

सर्वाधिक प्रचलित और अधिकांश ब्राह्मण-जैन-बौद्ध ग्रन्थों में उल्लिखित बिन्दुसार ही इसका वास्तविक नाम माना जाता है। यूनानी लेखकों के अमित्रोचेइस को डॉ. फ्लीट, लैसेन और डॉ. रायचौधरी जैसे विद्वानों ने संस्कृत के अमित्रघाट से व्युत्पन्न माना है। कुछ गुप्त साक्ष्य के अनुसार चक्रवर्ती सम्राट बिन्दुसार को अमित्रघात नाम की उपाधि से भी सम्मानित किया गया था।

चक्रवर्ती सम्राट बिन्दुसार का नाम बिन्दुसार क्यों और किसने रखाः-

जैन ग्रन्थों के अनुसारः- आचार्य चाणक्य ने सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य को प्रतिदिन बिष खाने का अभ्यास कराया था। परिणामतः चन्द्रगुप्त के शरीर में विष की मात्रा बहुत अधिक हो गयी थी। एक दिन सम्राट चन्द्रगुप्त की रानी इनके साथ भोजन कर रही थी तभी विष के प्रभाव से रानी की तत्काल मृत्यु हो गयी ।

मृत्यु के समय रानी गर्भवती थी, अतः घटना का ज्ञान होते ही चाणक्य ने शीघ्र ही रानी के उदर को फड़वाकर शिशु को निकलवा लिया। और गर्भस्थ शिशु की प्राण रक्षा की। उदर से निकले शिशु के सिर पर विष का एक बिन्दु लगा था। उस बिन्दु को देखने के बाद चाणक्य ने कहा यह बिन्दु ही इस शिशु के जीवन का सार होगा अर्थात् इसका नाम बिन्दुसार होगा। इस प्रकार चाणक्य ने नवजात शिशु का नाम बिन्दुसार रखा।

 

 

सम्राट बिन्दुसार का शासन-प्रबंधः-

वास्तव में सम्राट बिन्दुसार एक महान विजेता ही नहीं वरन् कुशल शासन-प्रबंधक भी थे। परन्तु ये गुण तो विश्व के अन्य शासकों में भी पाये जाते हैं, जनसेवा की भावना एवं उच्चकोटि की मानवता सम्राट बिन्दुसार जैसे विरले सम्राटों में ही देखने को मिलती है। प्राचीन भारत में मौर्य वंश के महान शासक चक्रवर्ती सम्राट बिन्दुसार जी को एक बड़े साम्राज्य पर शासन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था।

प्रशसन के क्षेत्र में बिन्दुसार ने अपने पिता की भाति ही शासन किया साम्राज्य को प्रन्तो में विभाजित कर प्रत्येक प्रान्त में कुमार या उपराजा नियुक्त किया प्रशासनिक कार्यो के लिए महामात्रो की नियुक्तियाँ की | दिव्यावदान के अनुसार अवन्ति राष्ट्र का उपराजा अशोक था |

केन्द्रीय शासन

सम्राट बिन्दुसार की शक्ति अपार थी, सर्वोच्च सत्ता उसी में निहित थी। प्रान्तों के शासकों की नियुक्ति वही करता था। शासन की सर्वोच्च शक्तियाँ व्यवस्थापिका, न्यायपालिका वं कार्यपालिका उसी में विद्यमान थी, परन्तु उसका शासन उदार निरंकुशवाद पर आधारित था। सिद्धान्त रूप में सम्राट बिन्दुसार सार्वभौम शक्ति सम्पन्न एवं शासन के सभी पक्षों का सर्वोच्च अधिकारी था।

मन्त्रि-परिषद्- राजा को परामर्श देने के लिए एक मन्त्रि-परिषद थी। यद्यपि साम्राज्य में सम्राट सर्वोपरि था, लेकिन चन्द्रगुप्त मौर्य के समान प्रशासनिक कार्यों में सहयोग देने के लिये सम्राट बिन्दुसार ने भी मन्त्री, मन्त्रिण और मन्त्रि-परिषद को बनाये रखा था। किन्तु सम्राट बिन्दुसार की मन्त्रि-परिषद में दृढ़-चरित्र, उच्च नैतिकता एवं धार्मिक आदर्शों का पालन करने वाले व्यक्ति ही मन्त्री बन सकते थे। सम्राट बिन्दुसार की सभा में 500 सदस्यों वाली एक मंत्रि-परिषद थी जिसका प्रधान खल्लटक था।

न्याय व्यवस्थाः-

किसी भी राज्य की उन्नति एवं स्थायित्व, उचित न्याय व्यवस्था पर आधारित होता है। सम्राट बिन्दुसार ने न्याय व्यवस्था की ओर समुचित ध्यान दिया। गाँवों के मामलों का फैसला ग्राम पंचायतें ही करती थीं। ग्रामों तथा नगरों के लिए अलग-अलग न्यायलय थे।

सैनिक व्यवस्थाः-

कोई भी राज्य बिना विशाल सेना के टिक नीहं सकता । सम्राट बिन्दुसार ने साम्राज्य की सुरक्षा के लिए विशाल सेना का घठन किया। इन सेनाओं में जल-सेना, पैदल-सेना, घुड़सवार, सेना, रथसेना, गजसेना आदि सेनाएँ सम्मिलित थीं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि प्रशासन के क्षेत्र में बिन्दुसार ने अपने पिता की भाँति ही शासन किया, साम्राज्य को प्रान्तों में विभाजित कर प्रत्येक प्रान्त में कुमार या उपराजा नियुक्त किया। प्रशासनिक कार्यों के लिए महामात्यों की नियुक्ति की । दिव्यावदान के अनुसार – अवन्ति राष्ट्र का उपराजा सम्राट अशोक था।

गुप्तचर व्यवस्थाः-

कौटिल्य के अनुसार, गुप्तचर राजा के नेत्र होते हैं। राज्य की प्रत्येक घटना की जानकारी के लिए साम्राज्य में गुप्तचरों का जाल फैला हुआ था। ये गुप्तचर सरकारी कर्मचारियों के कार्यों एवं जनता के विचारों को राजा तक पहुँचाते थे।

ग्राम प्रशासन

ग्राम, शासन की सबसे छोटी इकाई थी। ग्रामों का शासन पंचायते चलाती थी। जिनके सदस्यों का चुनाव गाँव के लोग करते थे। इन पंचायतों के प्रमुख ग्रामिक की नियुक्ति राज्य द्वारा की जाती थी।

सम्राट बिन्दुसार का व्यक्तित्वः-

सम्राट बिन्दुसार एक महत्वाकांक्षी शासक थे। उनका जीवन भी शान-शौकत में व्यतीत हुआ। सम्राट बिन्दुसार जी की प्रतिभा बहुमुखी थी। तथा धार्मिक सहिष्णुता उसके चरित्र की महान गरिमा थी। चूँकि विद्वानों की मान्यता है कि अमित्रघात का अर्थ शत्रुओं का वध करले वाला है। इसलिए सम्भवतः वह एक युद्धप्रिय शासक था। उसे आखेट, घुड़दौड़, पशुओं की लड़ाई तथा मल्ल-युद्ध देखने का बहुत शौक था। राजा अपना अधिकांश समय राजकाज में ही लगाता था। सम्राट बिन्दुसार जी महान प्रभावशाली और अद्वितीय व्यक्तित्व के धनी थे। यूनानी वृत्तान्तों से ज्ञात होता है कि बिन्दुसार दर्शनादि के अध्ययन और अनुशीलन में भी रुचि रखते थे।

चक्रवर्ती बिन्दुसार का विजय अभियान व साम्राज्य विस्तारः-

चक्रवर्ती सम्राट बिन्दुसार के लिए उसके पिता सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य ने एक विशाल सेना तथा सुव्यस्थित राज्य छोड़ा था। डियोडोरस के अनुसार, पाटलिपुत्र के राजा ने यूनानी लेखक आयम्बुलस का आदर-सत्कार किया था। सम्भवतः यह पाटलिपुत्र नरेश सम्राट बिन्दुसार था।

सम्राट बिन्दुसार ने चन्द्रगुप्त मौर्य द्वारा यूनानी राजाओं के साथ स्थापित मैत्री की ओर और अधिक ध्यान दिया तथा सम्राट बिन्दुसार ने यूनानी दुनिया के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बन्धों को जारी रखा। कुछ विद्वान् दक्षिण भारत की विजय का श्रेय सम्राट को देते हैं।

तारानाथ ने लिखा है कि “चाणक्य ने सोलह राज्यों के राजाओं एवं सामन्तों का विनाश किया। ” सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य की मृत्यु के बाद कुछ राज्यों में मौर्य सत्ता के विरुद्ध विद्रोह हुआ एवं चाणक्य ने सफलतापूर्वक उनका दमन किया।
लामातारानाथ सम्राट बिन्दुसार को 16 राज्यों का विजेता बताता है। उसके अनुसार चाणक्य ने पूर्वी और पश्चिमी समुद्र के मध्य के 16 राजाओं और सामन्तों को मारकर बिन्दुसार को चक्रवर्ती सम्राट बना दिया था।

तारानाथ के इस कथन की सत्यता के विषय में निश्चित रूम से कुछ नहीं कहा जा सकता है। किन्तु चक्रवर्ती सम्राट बिन्दुसार गी राजनीतिक उपलब्धियों के विषय में इतना जरूर कहा जा सकता है कि उसने उत्तराधिकार में प्राप्त मौर्य साम्राज्य को पूरण रूप से अक्षुण्ण बनाये रखा।

चक्रवर्ती सम्राट बिन्दुसार के शासनकाल में हुए विद्रोह का वर्णनः-

दिव्यावदान में चक्रवर्ती सम्राट बिन्दुसार के समय तक्षशिला में हुए दो विद्रोहों का उल्लेख मिलता है। प्रथम विद्रोह को दबाने के लिए जब कुमार अशोक वहाँ पहँचा तो वहाँ के निवासियों ने उससे कहा कि हम न तो कुमार के विरुद्ध हैं और न राजा बिन्दुसार के । दुष्ट अमात्य हमारा परिभव करते हैं।

इस कथन में सत्यता प्रतीत होती है, क्योंकि इसकी सिद्धि अशोक के कलिंग अभिलख से होती है जिसमें वह प्रान्तीय अमात्यों को सुचारू रूप से शासन संचालित करने का आदेश देता है और उस पर अंकुश लगाने की विधि-निषेधों का उल्लेख करता है। तक्षशिला में दूसरा विद्रोह सम्राट बिन्दुसार के शासन के अन्तिम दिनों में हुआ, जिसे दबाने के लिए राजकुमार सुसीम(सुमन) को भेजा गया। सुसीम विद्रोह दबाने में असफल रहा।

अशोक जब तक्षशिला में हुए प्रथम विद्रोह को दबाने में सफल हुआ, उसी समय उसने स्वश(खश) राज्य को भी जीत लिया। दूसरे विद्रोह को तब सुसीम नहीं दबा पाया तो वहाँ शान्ति स्थापित करने के लिए अशोक को भेजा गया। रायचौधरी के मतानुसार, खश, खस का ही अशुद्ध रूप है। स्टीन नामक विद्वान खसों का राज्य कस्तवार से वितस्ता(क्षेलम) की घाटी तक फैला हुआ माना है।

चक्रवर्ती सम्राट बिन्दुसार के महामंत्री चाणक्य की मृत्यु के कारणः-

बौद्ध ग्रन्थ वसंत्थपकासिनी, आर्यमंजुश्रीमूलकल्प, लामा तारानाथ और जैनग्रन्थ परिशिष्ट पर्वन् से ज्ञात होता है कि चाणक्य सम्राट बिन्दुसार के समय भी जीवित थे और कुछ समय के लिए सम्राट बिन्दुसार के भी महांत्री रहे। उसके पश्चात् खल्लाटक और राधागुप्त भी महामंत्री के पद पर नियुक्त किये गये। दिव्यावदान में सम्राट का उल्लेख हुआ है, जिसमें 500 सदस्य थे।

परिशिष्टपर्वन् के अनुसारः- चाणक्य के कहने पर सम्राट बिन्दुसार ने सुबन्धु को मंत्री पद पर नियुक्ति किया था, लेकिन कुछ समय बाद सुबन्धु चाणक्य से द्वष रखने लगा और उसने चाणक्य के विरुद्ध सम्राट बिन्दुसार के कान भरने शुरू कर दिया।

चाणक्य को उसकी माता की मृत्यु का उत्तरदायी बताते हुए उस पर कभी विश्वास न करने की बात कही। इन बातों से प्रभावित होकर सम्राट बिन्दुसार चाणक्य के विरुद्ध हो गये। जब चाणक्य को सम्राट बिन्दुसार और सुबन्धु की भावनाओं का ज्ञान हुआ तो दुःखी होकर अपना पद त्याग दिया और वन में जाकर तपस्या करने का निश्चय किया । बाद में जब सम्राट बिन्दुसार जी को सही बात का पता लगा तो जाकर उसने चाणक्य से क्षमा याचना की ।

चाणक्य ने क्षमा तो कर दिया पर वन से वापस नहीं आये। पर सुबन्धु चाणक्य के प्रति बराबर सशंकित रहता था कि वह कहीं वापस न आ जाये। इसलिए उसने वन में चाणक्य के तप करने के स्थान के समीप रखे उपलो के ढेर में एक अंगारा लगवा दिया, जिसके आग में जलकर चाणक्य मृत्यु को प्राप्त हो गया। चाणक्य के मृत्यु के बाद राधागुप्त उसका उत्तराधिकारी बना।

 

 

चक्रवर्ती सम्राट बिन्दुसार के दरबार में आये राजदूत तथा अन्य महत्वपूर्ण ऐतिहासिक तथ्यों का वर्णनः-

स्ट्रैबो के उल्लेखानुसार, सैण्डोकोडस(सम्राट चन्द्रगुप्त) के पुत्र एलिट्रोचेड्स (सम्राट बिन्दुसार) के दरबाल में सीरियाई नरेश एण्टियोकस प्रथम ने डामेकस नामक राजदूत भेजा था। डाइमेकस को मेगस्थनीज का उत्तराधिकारी भी माना जाता है तथा तीसरी शताब्दी के यूनानी लेखक एथिनियस ने भारतीय सम्राट अमिट्रोकेटीज (सम्राट बिन्दुसार) द्वारा सीरियाई नरेश से मीठी शराब, सूखा अंतीर और एक दार्शनिक भेजनी की प्रार्थना का उल्लेख किया है।

सीरियाई नरेश ने इसके उत्तर में कहा कि मीठी शराब और सूखे अंजीर तो भेज देंगे, परन्तु विद्वान (दार्शनिक ) के विक्रय का हमारे यहाँ रिवाज नहीं है। इन विभिन्न उल्लेखों से प्रकट होता है कि बिन्दुसार न अपने पिता के समान बाहर के देशों से मैत्री सम्बन्ध स्थापित किये। सम्राट बिन्दुसार आजीवक सम्प्रदाय के अनुयायी थे। उसकी राजसभा में आजीवक परिब्राजक निवास करता था।

चक्रवर्ती सम्राट बिन्दुसार का मूल्यांकन तथा इतिहास में स्थानः-

चक्रवर्ती सम्राट बिन्दुसार इतिहास की महान विभूतियों में से एक थे। सम्राट बिन्दुसार एक महान सम्राट, कुशल प्रशासक, सफल विजेता, धर्मज्ञ, धर्म-हित-चिन्तक और युग-निर्माता शासक, उदार धर्म-सहिष्णु, राष्ट्रप्रेमी, मानवता का पोषक थे। वह अपने समय का योग्य एवं महत्वकांक्षी युवराज था।

सम्राट बिन्दुसार जी भारतीय इतिहास के जाज्वल्यमान नक्षत्रों में एक है। सम्राट बिन्दुसार एक महान विजेता ही नहीं, विन् वे एक अत्यन्त योग्य शासक भी थे। उसने आचार्य चाणक्य के मार्गदर्शन में अपने साम्राज्य को जो कुशल शासन-व्यवस्था प्रदान की थी, वह उसके एक योग्य शासक होने का प्रमाण है। अतः इतिहास में सम्राट बिन्दुसार अद्वितीय हैं।

चक्रवर्ती सम्राट बिन्दुसार की शासन-अवधिः-

बौद्ध ग्रन्थ महावंश के अनुसार सम्राट अशोक का राज्याभिषेक बुद्ध के महापरिनिर्वाण के 218 वर्ष बाद (487-218) 269 ई. पू. में हुआ था। सम्राट अशोक का राज्यभिषेक उनकी मृत्यु के चार वर्ष बाद हुआ था। अतः अशोक का सिंहसनारोहण 269 + 4 = 273 ई. पू. में हुआ था।

पुराणों के अनुसार सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य ने 24 वर्ष और उसके पुत्र बिन्दुसार ने 25 वर्ष तक राज्य किया (कुल 49 वर्ष )। इस प्रकार सम्राट बिन्दुसार, के सिंहासनारोहण की तिथि 273 + 25 = 298 ई. पू. सिद्ध हो जाती है। सम्राट बिन्दुसार का शासन काल पुराणों में 25 वर्ष बताया गया है। अतः उसके शासन का अंत 273 ई. पू. में हुआ।

“भारत के स स्वर्ण युग में जीवन जितना सुखी और समृद्ध तथा हमारी संस्कृति जितनी रचनात्मक थी उतनी और कबी किसी युग में नहीं थी।”

चक्रवर्ती सम्राट बिन्दुसार के उत्तराधिकारीः-

सम्राट बिन्दुसार के बाद उसका पुत्र सम्राट अशोक राजगद्दी पर बैठा। चक्रवर्ती सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य द्वारा स्थापित एवं चक्रवर्ती सम्राट बिन्दुसार द्वारा पोषित-संरक्षित विशाल साम्राज्य के सुयोग्य उत्तराधिकारी सम्राट अशोक (प्रियदर्शी) ने अपने पिता सम्राट बिन्दुसार की मृत्यु के पश्चात् 273 ई. पू. में सत्ता की बागडोर सँभाला तथा चक्रवर्ती सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य द्वारा स्थापित मौर्य साम्राज्य को सम्राट अशोक ने उन्नति के चरम शिखर पर पहुँचाया। सम्राट अशोक न केवल बातीय इतिहाम में वरन् विश्व इतिहास में अपना गौरवपूर्ण स्थान रखते हैं।

राधामुकुद मुखर्जी के अनुसार, “सम्पूर्ण इतिहास में कोई भी राजा ऐसा नहीं हुआ जिसकी तुलना सम्राट अशोक से की जा सके।”

एच. जी. वैल्स का कथन है कि “सम्राट अशोक का नाम बड़े-बड़े और विभिन्न उपाधियों वाले सहस्त्रो शासकों में, जिसका वर्णन इतिहास में आता है, और सितारे की तरह चमकता है। वोल्गा से जापान तक आज भी सम्राट अशोक का सम्मान किया जाता है।”

 

 

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