आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का जीवन परिचय – Aachaary Mahavir Prasad Dwivedi Biography in Hindi

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी हिन्दी साहित्य की अद्वितीय विभूति है | उन्होंने हिन्दी भाषा और साहित्य की बहुमुखी सेवा की है | उनका साहित्य – सृजन विराट था | वे हिन्दी साहित्य के समर्थ साहित्यकार है | हिन्दी साहित्याकाश के देदीप्यमान नक्षत्र आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी युग – प्रवर्त्तक साहित्यकार, भाषा के पारिष्कारक, समालोचना के सूत्रधार एवं यशस्वी सम्पादक थे |

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का जीवन परिचय

आधुनिक हिन्दी साहित्य को समृध्द एवं श्रेष्ठ बनाने का श्रेय आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी ही को है उन्होंने हिंदी भाषा का संस्कार किया तथा गद्य को सुसंस्कृत, परिमार्जित एवं प्रांजल बनाया | अपनी विशिष्ट अभिव्यक्ति और प्रभावपूर्व प्रस्तुति के कारण आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी की गणना वर्तमान युग के अग्रणी साहित्यकारों में की जाती है | द्विवेदी जी हिन्दी गद्य के उन निर्माताओ में से है, जिनकी प्रेरणा और प्रयत्नों से हिन्दी भाषा को सम्बल प्राप्त हुआ है | आचार्य द्विवेदी जी को द्विवेदी युग का प्रवर्त्तक भी कहा जाता है |

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का जीवन परिचय – Aachaary Mahavir Prasad Dwivedi Biography in Hindi

नामआचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी
जन्म5 मई सन् 1864 ई०
जन्म – स्थानदौलतपुर (रायबरेली)
मृत्यु21 दिसम्बर, सन् 1938 ई०
मृत्यु – स्थानरायबरेली
पिता का नामरामसहाय द्विवेदी
माता का नामकोई साक्ष्य – प्रमाण प्राप्त नहीं

प्रस्तावना—

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने हिन्दी – भाषा और हिन्दी – साहित्य के क्षेत्र में अपना अमूल्य योगदान दिया | द्विवेदी जी की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी | द्विवेदी जी का प्रारम्भिक जीवन अत्यन्त कष्टमय था | इनका हृदय अत्यन्त विशाल था | द्विवेदी जी बचपन से ही कुशाग्र बुध्दि के थे | अपनी बुध्दि और लगन के बल पर द्विवेदी ने हिन्दी – साहित्य जगत में विशिष्ट स्थान प्राप्त किया | उन्होंने अपने शसक्त लेखन द्वारा हिंदी साहित्य की श्रीवृध्दि की | वे हिन्दी समालोचना के सूत्रधार माने जाते है |

उन्होंने इस और ध्यान आकर्षित किया कि किस प्रकार विदेशी विद्वानों ने भारतीय साहित्य की विशेषताओं का प्रकाशन अपने लेखो में किया है | इस प्रकार संस्कृत साहित्य की आलोचना से आरम्भ करके हिन्दी साहित्य की आलोचना की ओर जाने का मार्ग उन्होंने ही प्रशस्त किया | द्विवेदी जी बाल्यावस्था से ही काव्य – रचनाएं करने लगे थे | द्विवेदी जी जीवन – पर्यन्त एक समर्थ साहित्यकार के रूप में साहित्य – सेवा करते रहे | इसलिए द्विवेदी जी की गणना हिन्दी के महान लेखको में की जाती है |

जन्म – स्थान—

भाषा के संस्कारकर्ता, परिष्कारक उत्कृष्ट निबन्धकार, प्रखर आलोचक तथा आदर्श सम्पादक द्विवेदी जी का जन्म 5 मई सन् 1864 ई० में उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले के दौलतपुर गाँव में हुआ था |

माता – पिता—

हिन्दी गद्य साहित्य के युग – विधायक महावीर प्रसाद द्विवेदी के पिता का नाम श्री रामसहाय द्विवेदी था | इनके पिता पंडित रामसहाय द्विवेदी ईस्ट इंडिया कपनी की सेना में साधारण सिपाही थे | तथा इनकी माता जी के नाम के सम्बन्ध में कोई साक्ष्य प्रमाण प्राप्त नहीं है |

द्विवेदी जी का पूर्व नाम क्या था, तथा महावीर प्रसाद द्विवेदी कैसे पड़ा—

कहा जाता है कि इनके पिता रामसहाय द्विवेदी को महावीर का इष्ट था, इसलिए इन्होने पुत्र का नाम महावीरसहाय रखा | इनकी प्रारम्भिक शिक्षा गाँव की पाठशाला में हुई | पाठशाला के प्रधानाध्यापक ने भूल वश इनका नाम महावीर प्रसाद लिख दिया था | यह भूल हिन्दी – साहित्य में स्थाई बन गई |

शिक्षा—

परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण इनकी शिक्षा सुचारू रूप से सम्पन्न नहीं हो सकी | स्वाध्याय से ही इन्होने संस्कृत, हिन्दी, बांग्ला, मराठी, फारसी, गुजराती, अग्रेजी आदि भाषाओ का ज्ञान प्राप्त किया और तत्कालीन पत्र – पत्रिकाओ में अपनी रचनाएँ भेजने लगे | इनकी उत्कट ज्ञान – पिपासा कभी तृप्त न हुई | किन्तु जीविका के लिए इन्होने रेलवे में नौकरी कर ली | द्विवेदी जी को अनेक विषयों का ज्ञान था |

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी द्वारा किये गये महत्वपूर्ण कार्य—

प्रारम्भ में द्विवेदी जी ने रेलवे के तार – विभाग में नौकरी की | रेलवे में विभिन्न पदों पर कार्य करने के बाद झाँसी में डिस्ट्रिक्ट ट्रैफिक सुपरिण्टेण्डेण्ट के कार्यालय में मुख्य लिपिक हो गए | पाँच वर्ष बाद उत्तराधिकारी से खिन्न होकर इन्होने नौकरी से त्याग – पत्र दे दिया | आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी का साहित्यिक – जीवन में प्रवेश सन् 1903 ई० में ‘सरस्वती‘ पत्रिका के सम्पादक के रूप में हुआ था |

सन् 1903 ई० में रेलवे की नौकरी छोड़कर पूरी तरह साहित्य – सेवा में जुट गए | ‘सरस्वती‘ पत्रिका के सम्पादक का पद – भार सँभालने के बाद उन्होंने अपनी अद्वितीय प्रतिभा से हिन्दी – साहित्य को आलोकित किया, उसे निखारा और उसकी अभूतपूर्व श्रीवृध्दि की, तथा हिन्दी भाषा की सेवा के लिए अपना शेष जीवन अर्पित कर दिया |

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी का सबसे महत्वपूर्ण कार्य था— हिन्दी भाषा का संस्कार और परिष्कार | उन्होंने आरम्भिक युग की स्वच्छन्दता को नियन्त्रित किया | द्विवेदी जी ने हिन्दी – भाषा को व्याकरणसम्मत बनाने, उसके रूप को निखारने – संवारने, उसके शब्द – भण्डार को बढानें और उसको सशक्त, समर्थ एवं परिमार्जित बनाने का महान कार्य किया |

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी को प्राप्त उपाधि एवं सम्मान—

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी की साहित्य सेवाओं से प्रभावित होकर इनको सन् 1931 ई० काशी नागरी प्रचारिणी सभा ने आचार्य की उपाधि से तथा हिन्दी – साहित्य सम्मलेन ने साहित्य – वाचस्पति की उपाधि से सम्मानित किया | द्विवेदी जी को अनेक – अन्य उपाधि से भी विभूषित किया गया था |

मृत्यु – स्थान—

हिन्दी के यशस्वी साहित्यकार तथा सरस्वती के विरद पुत्र आचार्य द्विवेदी जी ने 21 दिसम्बर, सन् 1938 ई० को रायबरेली में सम्पूर्ण संसार को छोड़कर स्वर्गवासी हो गये |

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी का साहित्यिक – व्यक्तित्व—

आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी हिन्दी के युग – प्रवर्त्तक साहित्यकार थे | भारतेन्दु जी के पश्चात् द्विवेदी जी दुसरे प्रवर्त्तक साहित्यकार के रूप में विख्यात हुए | भारतेंदु जी ने हिंदी – साहित्य के क्षेत्र में नव युग का सूत्रपात किया तो द्विवेदी जी ने (भारतेंदु – युग) की भाषागत त्रुटियों को दूर किया तथा हिंदी – भाषा और उसकी शैली को परिष्कृत करके अधिक समृद्ध बनाया | द्विवेदी जी ने ज्ञान के विविध क्षेत्रो, इतिहास, अर्थशास्त्र, विज्ञान, पुरातत्व, चिकित्सा, राजनीति, जीवनी आदि से सामग्री लेकर हिंदी के आभावो की पूर्ति की | हिन्दी गद्य को माँजने – सँवारने और परिष्कृत करने में आजीव संलग्न रहे | तथा लेखको की अशुद्धियो को रेखांकित किया |

स्वयं लिखकर तथा दूसरो से लिखवाकर इन्होने हिंदी गद्य को पुष्ट और परिमार्जित किया | हिंदी गद्य के विकास में द्विवेदी जी का ऐतिहासिक महत्व है | द्विवेदी जी भाषा परिष्कारक के अतिरिक्त समर्थ समालोचक भी थे | इन्होने अपने लेखन में प्राचीन साहित्य एवं संस्कृति से लेकर आधुनिक काल तक के अनेक विषयों का समावेश करके साहित्य को समृद्ध किया | निबन्ध – लेखक के रूप में इन्होने निबन्ध – साहित्य को नयी दिशा और सामर्थ्य प्रदान की | द्विवेदी जी ने खड़ीबोली को काव्य – भाषा के आसन पर प्रतिष्टित किया | आचार्य द्विवेदी सच्चे अर्थो में युग विधायक आचार्य थे |

आचार्य द्विवेदी ने कवि, आलोचक, आचार्य और निबन्धकार आदि विभिन्न रूपों में हिंदी भाषा – साहित्य को परिमार्जित किया | इनकी अभूतपूर्व साहित्यिक सेवाओं के कारण ही इनके रचना – काल को हिंदी – साहित्य में द्विवेदी – युग कहा जाता है | अत: आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी जी के नाम पर ही द्विवेदी – युग का प्रतिष्ठित नामकरण हुआ | हिंदी – साहित्य की सेवा में द्विवेदी जी ने अपना अमूल्य योगदान दिया |

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी की कृतियाँ—

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी की रचना – सम्पदा विशाल है | हिन्दी के अतिरिक्त उन्होंने अर्थशास्त्र, इतिहास, वैज्ञानिक आविष्कार, पुरातत्व, राजनीति तथा धर्म आदि विषयों पर सफलतापूर्वक अपनी लेखनी चलाई | अपनी सशक्त लेखनी से द्विवेदी जी ने हिंदी – साहित्य जगत में अपना विशिष्ट स्थान बनाया है | उन्होंने पचास से अधिक ग्रन्थों तथा सैकड़ो निबंधो की रचना की | उनकी प्रमुख्य कृतियाँ इस प्रकार है —

काव्य— संग्रह – काव्य – मन्जूषा |

निबन्ध— द्विवेदी जी के सर्वाधिक निबन्ध सरस्वती तथा अन्य पत्र – पत्रिकाओ एवं निबंध – संग्रहों के रूप में प्रकाशित हुए है |

आलोचना—

  1. नाट्यशास्त्र
  2. हिन्दी – नवरत्न
  3. रसज्ञ – रंजन
  4. साहित्य – सीकर
  5. विचार – विमर्श
  6. साहित्य – सन्दर्भ
  7. कालिदास एवं उनकी कविता
  8. कालिदास की निरंकुशता
  9. नैषधचरित चर्चा

अनुदित—

  1. मेघदूत
  2. बेकन – विचारमाला
  3. शिक्षा
  4. स्वाधीनता
  5. विचार – रत्नावली
  6. कुमासम्भव
  7. गंगालहरी
  8. विनय – विनोद
  9. रघुवंश
  10. किरातार्जुनीय
  11. हिन्दी महाभारत

सम्पादन— ‘सरस्वती’ मासिक पत्रिका |

अन्य – रचनाएँ—

  1. हिन्दी भाषा की उत्पत्ति
  2. सम्पत्तिशास्त्र
  3. अद्भुत आलाप
  4. संकलन
  5. अतीत – स्मृति
  6. वाग्विलास
  7. जल – चिकित्सा
  8. वक्तृत्व – कला

भाषा—

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी भाषा सुसंस्कारी आचार्य थे | अत: इनकी भाषा परिष्कृत, परिमार्जित और व्याकरण – सम्मत है | इन्होने अपनी रचनाओं में साधारणतया सरल और व्यावहारिक भाषा को अपनाया है | द्विवेदीजी संस्कृत भाषा के प्रकाण्ड विध्दान थे | ये विषय के अनुसार भाषा का प्रयोग करने में सिध्दहस्त थे | अत: आलोचनात्मक निबन्धों में इनकी भाषा संस्कृतनिष्ठ , विवेचनात्मक निबन्धों शुध्द साहित्यिक तथा भावात्मक निबन्धों में आलंकारिक और काव्यात्मक हो गयी है | द्विवेदी जी भाषा के महान शिल्पी थे | एक चतुर शिल्पी की भाँति उन्होंने हिन्दी खड़ीबोली को सँवारा और उसमे प्राण – प्रतिष्ठापना भी की |

शैली—

कठिन – से कठिन विषय को बोधगम्य रूप में प्रस्तुत करना द्विवेदी जी की शैली की सबसे बड़ी विशेषता है | इनकी शैली के प्रमुख रूप निम्नलिखित है

  1. परिचयात्मक शैली
  2. गवेषणात्मक शैली
  3. भावात्मक शैली
  4. व्यंग्यात्मक शैली
  5. आलोचनात्मक शैली
  6. विचारात्मक शैली
  7. संवादात्मक शैली

आदि शैली है | यद्यपि द्विवेदी जी की निबन्ध – शैली में न तो सजीवता है और न प्रखरता, पर परिष्कार और परिमार्जन अवश्य है और इसी कारण उनका नाम हिन्दी के लेखको में अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता है |

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी का हिन्दी साहित्य में स्थान—

आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी हिन्दी – साहित्य के युग प्रवर्त्तक साहित्यकारों में एक थे | वे समाज और संस्कृति के क्षेत्र में अपने वैचारिक योगदान की दृष्टि से नवचेतना के संवाहक के रूप में अवतरित हुए | उन्हें शुध्द साहित्यिक खड़ीबोली का वास्तविक प्रणेता माना जाता है | उनकी विलक्षण प्रतिभा ने सन् 1900 ई० से सन् 1922 ई० तक हिन्दी – साहित्य के व्योम को प्रकाशित रखा, जिसकी ज्योति आज भी हिन्दी – साहित्य का मार्गदर्शन कर रही है |

इसी कारण हिंदी – साहित्य के इतिहास में सन् 1900 ई० से 1920 ई० तक के समय को द्विवेदी युग के नाम से जाना जाता है | द्विवेदी जी अपने महान दार्शनिक व्यक्तित्व एवं विलक्षण कृतित्त्व के लिए सदैव स्मरणीय बने रहेगे | उनके निधन से हिन्दी – साहित्य की जो क्षति हुई, उसकी पूर्ति असम्भव |

एक मनीषी साहित्यकार के रूप में आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी जी की सेवाओं के लिए सम्पूर्ण साहित्यिक जगत उनका सदैव ऋणी रहेगा |

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