ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित साहित्यकार – Writers honored with Jnanpith Award List in Hindi

दोस्तों आज के इस पोस्ट में हम आपको ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित साहित्यकारो के बारे में पूरी जानकारी बता रहे है | तो चलिए जानते हैं – Writers honored with Jnanpith Award List in Hindi (1961 – 2021).

ज्ञानपीठ पुरस्कार

ज्ञानपीठ पुरस्कार की शुरुआत 1961 ई० में हुआ इसके प्रायोजक भारतीय ज्ञानपीठ है | ज्ञानपीठ पुरस्कार मिलाने वाले को 11 लाख रुपये (हर वर्ष राशि में परिवर्तन होती रही है ) + प्रशस्तिपत्र + वाग्यदेवी की मूर्ती दी जाती है | ज्ञानपीठ पुरस्कार मरणोपरांत नहीं दिया जाता है |

ज्ञानपीठ पुरस्कार 22 भाषाओ में दिया जाता है | जो कि संविधान की 8 वी अनुसूचि में शामिल है |

विषय-सूची

गोविन्द शंकर कुरूप

प्रसिद्ध मलयालम साहित्यकार गोविन्द शंकर कुरूप (1901-1978) भारत के सर्वोच्च साहित्यिक पुरस्कार ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ के सबसे पहले विजेता थे। उनके कविता संग्रह ओटक्कुषल (बाँसुरी) को वर्ष 1965 का ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया। गोविन्द शंकर कुरूप की कविता संग्रह, निबन्ध संग्रह, नाटक, बाल साहित्य, आत्मकथा, अनुवाद सभी तरह की कृतियाँ प्रकाशित हुईं। गोविन्द शंकर उनको सोवियतलैण्ड नेहरू पुरस्कार (1967) तथा पद्म भूषण (1968) जैसे सम्मान भी प्राप्त थे। वे वर्ष 1968-72 तक राज्यसभा सदस्य भी रहे।

ताराशंकर बन्दोपाध्याय

ताराशंकर बन्दोपाध्याय (1898-1971) एक प्रख्यात बंगाली उपन्यासकार थे। उन्हें ‘गणदेवता’ उपन्यास के लिए वर्ष 1966 का ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया। चैताली घूरनी, जलसा घर, धरती देवता, कालिन्दी, कवि, गणदेवता, पंचग्राम, हंसुली बांकेर उपकथा, आरोग्य निकेतन, राधा इत्यादि इनके प्रमुख उपन्यास हैं। ज्ञानपीठ के अलावा उनको रबिन्द्र पुरस्कार (1955), साहित्य अकादमी पुरस्कार (1956), पद्मश्री (1962) व पद्म भूषण (1969) जैसे प्रतिष्ठित सम्मान भी प्राप्त थे।

कुपल्ली वेंकटप्पा पुटप्पा

कुपल्ली वेंकटप्पा पुटप्पा (1904-1994) एक भारतीय उपन्यासकार, कवि, नाटककार, समालोचक व विचारक थे। ‘कुवेम्पू’ नाम से लेखन करने वाले पुटप्पा को 20वीं सदी के महानतम कन्नड़ कवि के रूप में जाना जाता है। उनके द्वारा रचित महाकाव्य ‘श्री रामायण दर्शनम्’ के लिए उन्हें संयुक्त रूप से वर्ष 1967 का ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया। कर्नाटक सरकार द्वारा पुटप्पा को वर्ष 1958 में ‘राष्ट्रकवि’ (1958) और वर्ष 1992 में ‘कर्नाटक रत्न’ उपाधि प्रदान की गई। उनको भारत सरकार के पदम भूषण (1958) तथा पद्म विभूषण (1988) सम्मान भी प्राप्त थे।

उमाशंकर जोशी

उमाशंकर जेठालाल जोशी (1911-1988) एक प्रख्यात कवि, शिक्षाविद् और लेखक थे। उनको गुजराती भाषा की कृति ‘निशिथ’ के लिए संयुक्त रूप से वर्ष 1967 का ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया था। उमाशंकर जोशी के अन्य प्रमुख साहित्यिक कार्यों में गंगोत्री, विश्वशान्ति, हवेली, महाप्रस्थान आदि शामिल हैं। उनके द्वारा रचित एक समालोचना ‘कविनी श्रद्धा’ के लिए उन्हें वर्ष 1973 में साहित्य अकादमी पुरस्कार (गुजराती) से भी सम्मानित किया गया। उमाशंकर जोशी गुजराती साहित्य परिषद के अध्यक्ष (1968), साहित्य अकादमी के अध्यक्ष (1978-82), गुजरात युनिवर्सिटी के कुलपति और राज्यसभा सदस्य भी रहे।

सुमित्रानन्दन पन्त

सुमित्रानन्दन पन्त (1900-1977) बीसवीं सदी के सबसे प्रसिद्ध प्रगतिशील हिन्दी भाषा के साहित्यकार थे। सुमित्रानन्दन पन्त का वास्तविक नाम गुसाई दत्त था। ये वर्ष 1919 में महात्मा गाँधी के सत्याग्रह से प्रभावित होकर स्वाधीनता आन्दोलन में सक्रिय हुए। उनकी प्रमुख कृतियों में वीणा, उच्छावास, पल्लव, चदम्बरा ग्रन्थी, गुंजन, लोकायतन, मधु ज्वाला, मानसी, वाणी, युग पथ, सत्यकाम शामिल हैं। इन्हें ‘चिदम्बरा’ के लिए वर्ष 1968 का ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त हुआ, और ‘लोकायतन’ के लिए सोवियतलैण्ड नेहरू शान्ति पुरस्कार और हिन्दी साहित्य की अनवरत सेवा के लिए पद्म भूषण (1961) से अलंकृत किए गए |

रघुपति सहाय

सहाय (1896-1982) लेखक, समालोचक उर्दू के प्रख्यात कवि थे। ये फिराक गोरखपुरी से लेखन कार्य करते थे फिराक गोरखपुरी कृति ‘गुल-ए-नग्मा’ लिए वर्ष 1969 का ज्ञानपीठ पुरस्कार किया गया। फिराक की अन्य कृतियाँ मशअल, रूह-ए-कायनात, शेरिस्तान, शबनमिस्तान, की करवट, गुलबाग, चिरागा, शोअला साज, सत्यम् शिवम् सुन्दरम् आदि हैं। साहित्य अकादमी और सोवियतलैण्ड पुरस्कार तथा पद्म भूषण (1968) से भी किया गया था।

विश्वनाथ सत्यनारायण

तेलुगू साहित्यकार विश्वनाथ सत्यनारायण (1895-1976) का जन्म विजयवाड़ा (आन्ध्र प्रदेश) में हुआ था। उनके साहित्यिक कार्यों में कविताएँ, नाटक, उपन्यास, समालोचनाएँ, खण्ड काव्य, लघु कथाएँ, निबन्ध इत्यादि शामिल हैं। श्रीमद रामायण कल्पवृक्षम् के लिए उन्हें वर्ष 1970 का ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया था। विश्वनाथ सत्यनारायण ने गुण्टूर, विजयवाड़ा, मछलीपट्टनम् और करीमनगर के विभिन्न कॉलेजों में अध्यापन कार्य भी किया। वर्ष 1970 में भारत सरकार द्वारा उनको ‘पद्म भूषण’ प्रदान किया गया।

बिष्णु डे

महान प्रख्यात बंगाली कवि बिष्णु (1909-1982) अपनी कविताओं की संगीत गुणवत्ता और कविताओं कहानियों को सुशोभित करने लिए जाने जाते थे। बिष्णु डे बंगाली साहित्य ‘नए काव्य’ उत्थान करने श्रेय दिया जाता है। बिष्णु डे सबसे उल्लेखनीय साहित्यिक कृति ‘स्मृति-सत्ता भविष्यत’ नामक कविता संग्रह है। कविता संग्रह लिए बिष्णु डे को 1965 साहित्य अकादमी पुरस्कार और बाद में वर्ष 1971 ज्ञानपीठ पुरस्कार सम्मानित किया गया। उनकी लेखन शैली टीएस इलियट (ब्रिटिश लेखक) बहुत प्रभावी थी।

रामधारी सिंह दिनकर

हिन्दी के सुप्रसिद्ध कवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ (1908-1974) का जन्म सिमरिया (मुंगेर, बिहार) में हुआ था। राष्ट्रभक्त कवि के रूप में ‘दिनकर’ को उनकी राष्ट्रवाद की भावना को बढ़ाने वाली प्रेरणादायक देशभक्तिपूर्ण रचना के कारण राष्ट्रकवि (राष्ट्रीय कवि) के रूप में सम्मान दिया गया। दिनकर को उनके कविता संग्रह ‘उर्वशी’ के लिए वर्ष 1972 का ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया। रेणुका, रश्मिरथी, परशुराम की प्रतीज्ञा, इतिहास के आँसू, अर्धनारीश्वर, उजली आग, वेणु वन, नील कुसुम आदि उनकी अन्य प्रमुख कृतियाँ हैं। उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार (1959) और पद्म भूषण (1959) सम्मान भी प्राप्त हुए।

दत्तात्रेय रामचन्द्र बेन्द्रे

दत्तात्रेय रामचन्द्र बेन्द्रे (1896-1981) कन्नड़ भाषा के प्रसिद्ध कवि थे। काव्य रचनाओं के अतिरिक्त उन्होंने नाटक, कथा-साहित्य और गद्य कृतियाँ भी लिखी थीं, जिनमें कृष्णाकुमारी, गंगावतरण, हृदय समुद्र (कविता), निरामरण सुन्दरी (कथा-साहित्य) तथा मत्तु विमर्श, साहित्य संशोधन व विचार मंजरी (आलोचना साहित्य) प्रमुख हैं। उन्हें वर्ष 1964 में प्रकाशित उनके कविता संग्रह ‘नाकुतन्ती’ के लिए वर्ष 1973 का ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त हुआ। उनको साहित्य अकादमी पुरस्कार (1958), केलकर सम्मान (1965) व पद्मश्री (1968) जैसे प्रतिष्ठित भी प्राप्त हुए।

गोपीनाथ मोहन्ती

गोपीनाथ मोहन्ती (1914-1991) ओडिया भाषा के प्रसिद्ध साहित्यकार व उपन्यासकार थे। गोपीनाथ मोहन्ती के उपन्यास ‘माटीमटाल’ के लिए उनको वर्ष 1973 का ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया। 3 लाख 20 हजार शब्दों के माटीमटाल उपन्यास को सम्भवतः ओडिया भाषा का सबसे लम्बा उपन्यास माना जाता है। गोपीनाथ मोहन्ती की अन्य प्रमुख कृतियों में मन गहिरर चाषा (उपन्यास), घासर फूल, नव वधु, उड़ता खड़ (कहानी संग्रह), मुक्तिपथे, महापुरुष (नाटक) तथा कलाशक्ति (निबन्ध) शामिल हैं। इन्हें वर्ष 1955 में अमृतरा सन्तान उपन्यास के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार प्रदान किया गया। इन्हें सोवियतलैण्ड नेहरू पुरस्कार (1970) तथा पद्म भूषण (1981) से भी सम्मानित किया गया।

विष्णु सखाराम खाण्डेकर

मराठी साहित्यकार विष्णु सखाराम खाण्डेकर (1898-1976) का जन्म सांगली (महाराष्ट्र) में हुआ था। उन्होंने मराठी व्याकरण में खान्देकसरी अलंकार की स्थापना भी की। खाण्डेकर के ‘ययाति’ उपन्यास को वर्ष 1974 का ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त हुआ। खाण्डेकर को पद्मभूषण (1968), साहित्य अकादमी फैलोशिप (1970) आदि सम्मान भी प्राप्त थे। सरकार द्वारा विष्णु सखाराम खाण्डेकर के सम्मान में वर्ष 1998 में एक स्मारक डाक टिकट भी जारी किया गया।

पीवी अकीलन

तमिल लेखक पीवी अकीलन (1922-1988) का मूल नाम ‘पीवी अकीलन्दम’ था। अकीलन अपनी यथार्थवादी और रचनात्मक लेखन शैली के लिए प्रसिद्ध थे। अकीलन द्वारा रचित सामाजिक उपन्यासों में नेंचिन अलइगल, पवई विलाकू, धुनाइक, अवलाकू, पुडु वेलम स्नेहिथी आदि प्रमुख हैं, अकीलन की तमिल रचना ‘चित्रप्पवई’ को वर्ष 1975 का ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त हुआ, इसके अलावा उनके द्वारा रचित एक अन्य उपन्यास ‘वंगइन मैन्धन’ को वर्ष 1963 में साहित्य अकादमी पुरस्कार भी दिया गया था।

आशापूर्णा देवी

कोलकाता (पश्चिम बंगाल) में जन्मी आशापूर्णा देवी (1909-1995) बंगाली भाषा की प्रख्यात उपन्यासकार थीं। आशापूर्णा देवी ने लगभग 225 कृतियों की रचना की, जिनमें अग्नि परीक्षा, छाड़पत्र, प्रथम प्रतिश्रुति, सुवर्णलता, उत्तरपुरुष तथा जल और आगुन, सोनाली संध्या, आकाश माटी, एक आकाश अनेक तारा (कहानी) प्रमुख हैं। उनके उपन्यास ‘प्रथम प्रतिश्रुति को वर्ष 1976 के ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। आशापूर्णा देवी को टैगोर पुरस्कार (1964) तथा पद्मश्री (1976) से भी सम्मानित किया गया था। आशापूर्णा देवी ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त करने वाली पहली महिला थीं।

कोटा शिवराम कारन्त

कोटा शिवराम कारन्त (1902-1997) कन्नड़ भाषा के विख्यात साहित्यकार थे। शिवराम कारन्त को कला विषयक क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान के लिए जाना जाता है। उनकी प्रमुख कृतियों में कर्णार्जुन, नारद गर्वभंग, मंगलारति, कीचड सैरंध्री (नाटक), हसिवू, हावु, गद्य-ज्ञान मैगल्लन दिनचरिविंद (कहानी), हुच्चू मनस्सिन हत्तु मुखगलु (आत्मकथा) देवदूतरु, सरसम्मन समाधि, मुगिद युद्ध, गोण्डारण्य मृजन्म (उपन्यास) आदि शामिल हैं। शिवराम कारन्त की रचना ‘मूकाज्जिय कनसुगलू’ को वर्ष 1977 का ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त हुआ था। शिवराम कारन्त को साहित्य अकादमी पुरस्कार (1959) तथा पद्म भूषण से भी सम्मानित किया गया था।

सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’

हिन्दी के सुप्रसिद्ध साहित्यकार सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ (1911-1987) का जन्म कुशीनगर (उत्तर प्रदेश) में हुआ था। ‘अज्ञेय’ को प्रतिभासम्पन्न कवि, शैलीकार, कथा साहित्य को एक महत्वपूर्ण मोड़ देने वाले कथाकार, ललित निबन्धकार, सम्पादक और सफल अध्यापक के रूप में जाना जाता है। उनकी कृतियों में कविता भग्नदूत, चिन्ता, इत्यलम, हरी घास पर क्षण भर, बावरा अहेरी, आंगन के पार द्वार, पूर्वा, क्योंकि मैं उसे जानता हूँ, सागर मुद्रा, नदी के द्वीप, अपने-अपने अजनबी आदि प्रमुख हैं। अज्ञेय की वर्ष 1967 में प्रकाशित कृति ‘कितनी नावों में कितनी बार’ को वर्ष 1978 का ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया। अज्ञेय को साहित्य अकादमी पुरस्कार (1978) और गोल्डन रीथ पुरस्कार (1983) जैसे पुरस्कारों से भी सम्मानित किया गया।

बीरेन्द्र कुमार भट्टाचार्य

बीरेन्द्र कुमार भट्टाचार्य (1924-1997) को आधुनिक असमिया साहित्यकारों में से एक माना जाता है। बीरेन्द्र कुमार भट्टाचार्य अपनी शिक्षा के बाद साहित्य लेखन, पत्रकारिता और स्वाधीनता आन्दोलन में एक साथ कार्य किया और तीनों ही क्षेत्र में अपने समर्पित योगदान के लिए अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। इनकी साहित्यिक कृतियों में उपन्यास, कहानी-संग्रह, कविता-संकलन, यात्रा वृत्तान्त तथा निबन्ध, लोक साहित्य और गद्य लेखन सभी सम्मिलित हैं। अन्य प्रमुख कृतियों में प्रतिपद, प्रजा का राज एवं पाखी घोड़ा शामिल हैं। डॉ. भट्टाचार्य को ‘इयारुहंगम’ के लिए वर्ष 1961 के साहित्य अकादमी पुरस्कार और ‘मृत्युंजय’ के लिए वर्ष 1979 के ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

शंकरन कुट्टी पोट्टेक्काट्ट

शंकरन कुट्टी पोट्टेक्काट्ट (1913-1982) मलयालम भाषा के प्रसिद्ध साहित्यकार थे। कालीकट (केरल) में जन्में पोट्टेक्काट्ट की प्रसिद्ध कृतियों में ओरू तेरर्शवण्टे कथा, नादान प्रेमम, चन्द्रकान्तम और मणिमलिका शामिल हैं। इनकी कृति ‘ओरू देसाथिण्टे कथा’ को वर्ष 1980 का ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त हुआ था। उनको साहित्य अकादमी पुरस्कार (1977), केरल साहित्य अकादमी पुरस्कार (1972) आदि सम्मान दिए गए थे। वर्ष 1962 में उनको लोकसभा का सदस्य भी चुना गया था।

अमृता प्रीतम

प्रसिद्ध कवयित्री, उपन्यासकार व निबन्धकार अमृता प्रीतम (1919-2005) को 20वीं सदी की पंजाबी भाषा की सर्वश्रेष्ठ कवयित्री माना जाता है। अमृता प्रीतम ने कुल मिलाकर लगभग 100 पुस्तकें लिखीं, जिनमें उनकी चर्चित आत्मकथा ‘रसीदी टिकट’ भी शामिल है। अमृता प्रीतम को उनकी रचना ‘कागज ते कैनवास’ के लिए वर्ष 1981 का ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया। अमृता प्रीतम को साहित्य अकादमी पुरस्कार (1956), बुल्गारिया वैरोव पुरस्कार (1988), पद्मश्री (1969), पद्म विभूषण (2004) आदि सम्मान भी प्राप्त थे। अमृता प्रीतम साहित्य अकादमी पुरस्कार की पहली महिला विजेता थीं, साथ ही ‘पद्मश्री’ प्राप्त करने वाली पहली पंजाबी महिला भी थीं।

महादेवी वर्मा

हिन्दी की सर्वाधिक प्रतिभावान कवयित्रियों में से एक महादेवी वर्मा (1907-1987) का जन्म फर्रुखाबाद (उत्तर प्रदेश) में हुआ था। आधुनिक हिन्दी की सबसे सशक्त कवयित्रियों में से एक होने के कारण उन्हें ‘आधुनिक मीरा’ के नाम से भी जाना जाता है। उनकी कृतियों में नीहार, रश्मि, दीपशिखा, सप्तपर्णा (काव्य), अतीत के चलचित्र, स्मृति की रेखाएँ, पथ के साची (पद्य), श्रृंखला की कड़ियाँ, विवेचनात्मक गद्य (निबन्ध) आदि प्रमुख हैं। महादेवी वर्मा के काव्य संग्रह ‘यामा’ को वर्ष 1982 का ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया। महादेवी वर्मा को भारत भारती पुरस्कार (1943), साहित्य अकादमी फैलोशिप (1979), पद्म भूषण (1956), पद्म विभूषण (1988) आदि सम्मान भी प्राप्त थे।

मास्ति वेंकटेश आयंगर

कोलार (कर्नाटक) में जन्मे मास्ति वेंकटेश आयंगर (1891-1986) को ‘कन्नड़ कहांनी के प्रवर्तक और ‘कन्नड़ की सम्पत्ति’ के रूप में ख्याति प्राप्त थी। मास्ति का उल्लेख प्रायः एक स्वच्छन्दतावादी रचनाकार के रूप में किया जाता है। उनकी कृतियों में नवरात्रि, श्री रामपट्टाभिषेक, मानवी, संक्रान्ति (काव्य), चेन्नबसवनायक, सुबण्णा, शेषम्मा (उपन्यास), शान्ता, सावित्री, मंतुला, अनारकली (नाटक) तथा भाव (आत्मकथा) आदि प्रमुख हैं। मास्ति को उनके उपन्यास ‘चिक्क वीर राजेन्द्र के लिए वर्ष 1983 का ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया। मास्ति को मैसूर विश्वविद्यालय द्वारा मानद डी. लिट उपाधि से भी सम्मानित किया गया था।

तकाजी शिवशंकर पिल्लै

तकाजी शिवशंकर पिल्लै (1912-1999) मलयालम भाषा के एक प्रख्यात उपन्यासकार व लघु कथा लेखक थे। उनकी कृतियों में समाज के उत्पीडित वर्गों पर ध्यान केन्द्रित किया गया है। उन्होंने अपने उपन्यासों व लघु कथाओं में केरल के 20वीं सदी के समाज का प्रमुखता से वर्णन किया। उनके उपन्यास ‘थोट्टियुडे मकन’ को एक अग्रणी मलयालम यथार्थवादी उपन्यास के रूप में प्रसिद्धि प्राप्त है। तकाजी शिवशंकर पिल्लै की ऐतिहासिक रचना ‘कयर’ को वर्ष 1984 का ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया, जबकि ‘चेम्मीन’ के लिए उन्हें वर्ष 1957 में साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया। इन्हें भारत सरकार द्वारा पद्म भूषण सम्मान भी प्रदान किया गया।

पन्नालाल पटेल

पन्नालाल पटेल (1912-1989) गुजराती भाषा के प्रख्यात साहित्यकार थे। लगभग छह दशक पहले गुजराती साहित्य जगत में उनका आविर्भाव एक चमत्कार माना गया था। पन्नालाल पटेल ने अनेकों लेखन कार्य और प्रकाशन कार्य किए थे, जिनमें उपन्यास, कहानियाँ, नाटक, जीवनी, बच्चों के साहित्य और विविध प्रकार के अन्य लेख भी शामिल हैं। जिन्दगी संजीवनी (भाग 1-7) इनकी आत्मकथा है। वर्ष 1947 में प्रकाशित पन्नालाल पटेल के उपन्यास ‘मानवीनी भवाई” के लिए उन्हें वर्ष 1985 का ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया। उमाशंकर जोशी के बाद पन्नालाल पटेल ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त करने वाले गुजराती भाषा के दूसरे साहित्यकार थे।

सच्चिदानन्द राउत राय

उड़िया साहित्यकार सच्चिदानन्द राउत राय (1916-2004) को आधुनिक उड़िया कविता के भगीरथ के रूप में प्रसिद्धि प्राप्त थी तथा उन्हें कथा-शिल्पी, नाट्यकार एवं साहित्य मनीषी के रूप में भारतीय साहित्यकारों में अग्रगण्य माना जाता है। उनकी प्रमुख कृतियों में पाथेय, पूर्णिमा, रक्त शिखा, बाजी राऊत, अभिजान (काव्य संग्रह), मसानीर फूला, माटीर ताज, छई (कथा संग्रह) तथा साहित्य विचार और मूल्यबोध, आधुनिक साहित्य (समालोचना) शामिल हैं। राउत राय को उड़िया साहित्य में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए वर्ष 1986 का ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया। राउत राय को साहित्य अकादमी पुरस्कार (1963), सोवियतलैण्ड नेहरू पुरस्कार (1965), पद्मश्री (1962) आदि सम्मान भी प्राप्त थे।

विष्णु वामन शिरवाडकर

विष्णु वामन शिरवाडकर (1912-1999) एक प्रख्यात मराठी कवि, नाटककार, उपन्यासकार, लघु कथा लेखक थे। वे ‘कुसुमाग्रज’ नाम से लेखन कार्य करते थे। उनके द्वारा रचित कविता संग्रह “विशाखा’ (1942) को आज भी भारतीय साहित्य की अनमोल कृति के रूप में प्रसिद्धि प्राप्त है। कुसुमाग्रज की कृतियों में हिमरेशा, छान्दोमयी, जीवनलहरी, समिधा, काना, किनारा, मुक्तायन, मराठी मति, स्वागत आदि प्रमुख हैं। कुसुमाग्रज को उनके मराठी नाटक ‘नटसम्राट’ के लिए वर्ष 1987 का ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया। कुसुमाग्रज को साहित्य अकादमी पुरस्कार (1974), पद्म भूषण (1991) जैसे अन्य पुरस्कार भी प्राप्त थे।

सी. नारायण रेड्डी

सिंगीरेड्डी नारायण रेड्डी (1931-2017) तेलुगू और उर्दू भाषा के प्रख्यात कवि व लेखक थे। वह एक प्रोफेसर, गीतकार, अभिनेता और राजनेता भी थे। उन्होंने फिल्मों के लिए 1000 से अधिक गीत लिखे थे। सी. नारायण रेड्डी की कृतियों में विश्वगीती नागार्जुन सागरम, अजन्ता सुन्दरी, विश्वनाथ नायडू, रामप्पा, ऋतु चक्रम, रेक्कालू, मीराबाई आदि प्रमुख हैं। सी. नारायण रेड्डी को उनके काव्य संग्रह ‘विश्वम्भरा’ के लिए वर्ष 1988 का ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया। उन्हें पदमश्री (1977) और पद्म विभूषण (1992) से भी सम्मानित किया गया।

कुर्रतुलएन हैदर

अलीगढ़ (उत्तर प्रदेश) में जन्मी कुर्रतुलएन हैदर (1926-2007) उर्दू भाषा की प्रसिद्ध लेखिका थी। कुर्रतुलएन हैदर का पहला उपन्यास ‘मेरे भी सनमखाने वर्ष 1949 में प्रकाशित हुआ था। यह उपन्यास भारत की समन्वित संस्कृति के माध्यम से मानवता की त्रासदी प्रस्तुत करता है। उनके उपन्यास ‘आखिरी शब के हमसफर’ को वर्ष 1989 का ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त हुआ। कुर्रतुलएन हैदर को साहित्य अकादमी पुरस्कार (1967), सोवियतलैण्ड नेहरू पुरस्कार (1969), गालिब पुरस्कार (1985), इकबाल सम्मान (1987) भी प्राप्त थे। उनको भारत सरकार द्वारा पद्मश्री (1984) व पद्म भूषण (2005) सम्मान भी दिए गए।

विनायक कृष्ण गोकाक

विनायक कृष्ण गोकाक (1909-1992) को कन्नड़ भाषा के प्रमुख साहित्यकारों में गिना जाता है। कवि, उपन्यासकार, समालोचक, नाटककार और निबन्ध लेखक के रूप में 50 वर्ष से भी अधिक समय तक सक्रिय रहे गोकाक को कन्नड भाषा में आधुनिक समालोचना का जनक कहा जाता है। उनकी प्रमुख कृतियों में अभ्युदय, याबा पृथिवी, कोनेय दिन, समरसवे जीवन, नव्य भारत, प्रवादि नरहरि, जननायक, युगान्तर, द सॉन्ग ऑफ लाइफ एण्ड अदर पोयम्स, इन लाइफ्स टेम्पल. कश्मीर एण्ड द ब्लाइण्ड मैन आदि शामिल हैं। वर्ष 1982 में प्रकाशित उनके काव्य संकलन ‘भारत सिन्धु रश्मि’ को वर्ष 1990 का ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया। ज्ञानपीठ के अलावा विनायक कृष्ण गोकाक को साहित्य अकादमी पुरस्कार, पद्मश्री (1961) आदि कई प्रतिष्ठित सम्मान भी दिए गए।

सुभाष मुखोपाध्याय

बांग्ला साहित्यकार सुभाष मुखोपाध्याय (1919-2003) को 20वीं सदी के सबसे प्रमुख बंगाली कवियों में गिना जाता है। सुभाष मुखोपाध्याय का काव्य-जीवन माँ. माटी, मानवता और संघर्ष को समर्पित रहा।

सुभाष मुखोपाध्याय की प्रमुख कृतियों में चिरकुट अग्निकोण, फुल फुटुक ए भाई. काल मोधुमाश, बंगालिर इतिहास आदि शामिल हैं। उनको उनकी रचना पदालिक के लिए वर्ष 1991 का ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया। सुभाष मुखोपाध्याय को साहित्य अकादमी पुरस्कार (1964), एफ्रो-एशियन लोटस प्राइज (1977), आनन्द पुरस्कार (1991), सोवियतलैण्ड नेहरू पुरस्कार तथा पद्म भूषण (2003) आदि सम्मान भी दिए गए थे।

नरेश मेहता

नरेश मेहता (1922-2000) हिन्दी के यशस्वी कवि एवं शीर्षस्थ लेखकों में से हैं। उनके काव्य में रूपक, मानवीकरण, उपमा, उत्प्रेक्षा अनुप्रास आदि का प्रयोग देखने को मिलता है। उनके नाम 50 से अधिक प्रकाशन कार्य दर्ज हैं, जिनमें कविता से लेकर नाटक तक सभी शामिल हैं। उनकी कृतियों में उत्तर कथा एक समर्पित महिला, कितना अकेला आकाश, दैत्या, दो एकान्त, प्रति श्रुति, प्रवाद पर्व, हम अनिकेतन, बोलने दो चीड़ को आदि प्रमुख हैं। उन्हें हिन्दी साहित्य को दिए गए उल्लेखनीय योगदान हेतु वर्ष 1992 का ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया। नरेश मेहता को वर्ष 1988 में साहित्य अकादमी पुरस्कार भी दिया गया था।

सीताकान्त महापात्र

सीताकान्त महापात्र (1937) ओडिया और अंग्रेजी भाषा के एक प्रतिष्ठित भारतीय कवि और साहित्यिक आलोचक हैं। सीताकान्त महापात्र एक सेवानिवृत्त भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) अधिकारी हैं, जो वर्ष 1961 से 1995 तक सेवा में रहे। इनके अब तक काव्य संग्रह, निबन्ध संग्रह, चिन्तनशील कार्यों के अलावा कई अनुवाद कार्य प्रकाशित हो चुके हैं। सीताकान्त महापात्र को भारतीय साहित्य के संवर्द्धन में उत्कृष्ठ योगदान के लिए वर्ष 1993 का ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया। इनको साहित्य अकादमी पुरस्कार (1974), पद्म भूषण (2003). पद्म विभूषण (2010), साहित्य अकादमी फैलो (2013). सार्क साहित्यिक पुरस्कार (2015) तथा टैगोर शान्ति पुरस्कार (2017) भी प्रदान किए जा चुके हैं।

यूआर अनन्तमूर्ति

उडूपी राजगोपालाचार्य अनन्तमूर्ति (1932-2014). कन्नड़ भाषा के प्रसिद्ध साहित्यकार, आलोचक और शिक्षाविद थे। उन्हें कन्नड़ साहित्य के ‘नव्या आन्दोलन का प्रणेता माना जाता है। भारतीपुत्र, दिव्या मिथुन संस्कार, सन्निवेश आदि उनकी मुख्य रचनाएँ है। कन्नड़ साहित्य के दिए गए उनके महत्वपूर्ण योगदान के लिए उन्हें वर्ष 1994 का ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया। उन्हें पद्म भूषण (1998), साहित्य अकादमी फैलोशिप (2004), आदि कई सम्मान प्राप्त थे। उन्होंने महात्मा गाँधी विश्वविद्यालय तिरुवनन्तपुरम और केन्द्रीय विश्वविद्यालय गुलबर्गा के कुलपति के रूप में भी काम किया था।

एमटी वासुदेवन नायर

एमटी वासुदेवन नायर (1933) एक भारतीय लेखक, पटकथा लेखक और फिल्म निर्देशक हैं। कुडलूर (मद्रास प्रेजीडेन्सी) में जन्मे एमटी वासुदेवन नायर आधुनिक मलयालम साहित्य में एक शानदार और बहुमुखी लेखक हैं। इन्होंने अपना पहला उपन्यास “नालूकेट्टू’ 23 वर्ष की आयु में लिखा था तथा इसे केरल साहित्य अकादमी पुरस्कार (1958) प्राप्त हुआ था। एमटी वासुदेवन नायर को उनकी कृति ‘रन्दमूझम’ के लिए वर्ष 1995 का ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया। इसके अतिरिक्त इनको साहित्य अकादमी पुरस्कार (1970) और पद्म भूषण (2005) सम्मान भी दिया जा चुका है। फिल्म (1970) क्षेत्र में एमटी वासुदेवन नायर को सात राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार दिए जा चुके हैं।

महाश्वेता देवी

महाश्वेता देवी (1926-2016) भारत की प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता और लेखिका थीं। उन्होंने बांग्ला भाषा में बेहद संवेदनशील तथा वैचारिक लेखन के माध्यम से उपन्यास तथा कहानियों द्वारा साहित्य को समृद्धिशाली बनाया। महाश्वेता देवी ने कम आयु में ही लेखन कार्य शुरू कर दिया था और विभिन्न साहित्यिक पत्रिकाओं के लिए लघु कथाओं का महत्वपूर्ण योगदान दिया।

महाश्वेता देवी की कृतियों पर फिल्मों का निर्माण भी हुआ है, जिनमें संघर्ष (1968), रुदाली (1993), हजार चौरासी की माँ (1998) तथा माटी माई (2006) प्रमुख हैं। महाश्वेता देवी को उनके साहित्यिक कार्य हजार चौरासी की माँ के लिए वर्ष 1996 का ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया। इनको मैग्सेसे पुरस्कार (1997), साहित्य अकादमी पुरस्कार (1979), पद्मश्री (1986), पद्म विभूषण (2006) आदि सम्मान भी दिए जा चुके हैं।

अली सरदार जाफरी

अली सरदार जाफरी (1913-2000) उर्दू भाषा के एक प्रसिद्ध साहित्यकार थे। अली सरदार जाफरी की ख्याति एक ऐसे शायर के रूप में थी. जिसने शायरी में छन्द-मुक्त कविता की परम्परा शुरू की। यद्यपि जाफरी ने अपनी रचनाओं में फारसी का अधिक प्रयोग किया, फिर भी उनकी रचनाएँ आम आदमी तक पहुंची और बेहद पसन्द की गई। उर्दू साहित्य को दिए गए उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें वर्ष 1997 का ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया। उनको पद्मश्री (1967), राष्ट्रीय इकबाल सम्मान (1978), उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी पुरस्कार आदि भी प्राप्त थे।

गिरीश कर्नाड

गिरीश रघुनाथ कर्नाड (1938) एक सुप्रसिद्ध कन्नड़ कवि रंगमेच कमी, कहानी लेखक, नाटककार, फिल्म निर्देशक और फिल्म अभिनेता है। गिरीश कर्नाड की मुख्य कृतियाँ ययाति तुगलक, हयवदन, अंजु मल्लिगे आदि हैं। इन्होंने उत्सव, मंथन, इकबाल, डोर आदि हिन्दी फिल्मों में अभिनय भी किया है। गिरीश कर्नाड को कन्नड साहित्य में इनके योगदान और ‘ययाति’ कृति के लिए वर्ष 1998 का ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया। इनको संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1972), कन्नड साहित्य अकादमी पुरस्कार (1992), साहित्य अकादमी पुरस्कार (1994), कालिदास सम्मान (1995), पद्मश्री (1974) और पद्म भूषण (1992) से भी सम्मानित किया जा चुका है।

निर्मल वर्मा

निर्मल वर्मा (1929-2005) का हिन्दी साहित्य के अन्तर्गत कहानी में आधुनिकता का बोध लाने वाले कहानीकारों में अग्रणी स्थान है। रात का रिपोर्टर, एक चिथड़ा सुख, लाल टीन की छत वे दिन आदि उनके चर्चित उपन्यास है। हिन्दी साहित्य में उल्लेखनीय योगदान के लिए निर्मल वर्मा को वर्ष 1999 का ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया। निर्मल वर्मा को यह पुरस्कार गुरदयाल सिंह पंजाबी साहित्यकार के साथ संयुक्त रूप से दिया गया था। उनको पद्मभूषण 2002, मूर्तिदेवी पुरस्कार (1995), साहित्य अकादमी पुरस्कार (1985) आदि कई अन्य सम्मान भी प्राप्त थे।

गुरदयाल सिंह

प्रसिद्ध पंजाबी साहित्यकार गुरदयाल सिंह (1833-2016) आम आदमी की बात कहने वाले पंजाबी भाषा के विख्यात कथाकार थे। गुरदयाल सिंह को वर्ष 1999 का ज्ञानपीठ पुरस्कार संयुक्त रूप से दिया गया था। गुरदयाल सिंह की प्रमुख कृतियों में मढ़ी दा दीवा, अणहोए, कुवेला उपन्यास, सभी फूल, बेगाना पिण्ड, करीर दी ढींगरी (कहानी), फरीदा रातीं, वड्डीथाम, निक्की मोटी गल (नाटक) शामिल हैं। गुरदयाल सिंह को साहित्य अकादमी पुरस्कार (1975), पंजाब साहित्य अकादमी पुरस्कार (1989) सोवियतलैण्ड नेहरू पुरस्कार (1900), शिरोमणि साहित्यकार पुरस्कार (1992) और पद्मश्री (1998) से भी सम्मानित किया गया था।

इन्दिरा गोस्वामी

असमिया साहित्यकार इन्दिरा गोस्वामी (1942-2010) को उनके मौलिक लेखन के लिए जाना जाता है। उन्होंने भारत में महिला सशक्तीकरण और सामाजिक कुरीतियों पर काफी लेखन कार्य किया था। इन्दिरा गोस्वामी की साहित्यिक कृतियों में मामरे धरा तरोवाल अरु दुखन, अहिरण, नीलकण्ठी ब्रज, दाशरथीर खोज, चिनाकि मरम, कइना, हृदय एक नदीर नाम, आधा लिखा दस्तावेज, दस्तावेजर नतुन पृष्ठा आदि प्रमुख हैं। असमिया साहित्य में उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें वर्ष 2000 का ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला। उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार (1983), असम साहित्य सभा पुरस्कार (1988), भारत निर्माण पुरस्कार (1989), अन्तर्राष्ट्रीय तुलसी पुरस्कार (1999) आदि से भी सम्मानित किया गया।

राजेन्द्र शाह

गुजराती भाषा के साहित्यकार राजेन्द्र केशवलाल शाह (1913-2010) के पहले कविता संग्रह ‘ध्वनि’ ने ही गुजराती साहित्य की दुनिया में भारी हलचल पैदा कर दी थी। गुजराती साहित्य में अमूल्य योगदान के लिए राजेन्द्र शाह को वर्ष 2001 का ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया। उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार (1964), नर्मद चन्दक (1977), गुजरात साहित्य परिषद् का अरविन्द सुवर्ण चन्दक (1980), गुजरात सरकार का नरसिंह मेहता पुरस्कार (1997) आदि सम्मान भी दिए गए।

दण्डपाणि जयकान्तन

दण्डपाणि जयकान्तन (1934-2015) को तमिल भाषा के सर्वश्रेष्ठ लेखकों में शामिल किया जाता है। उनकी प्रमुख कृतियों में वज्जकई असाइकिटाडू, जिरालयम, ऋषिमूलम (उपन्यास) युगसंथी, बोम्मई, एन्थीरम, पिनाक्कू पुथिमा वारपूगल (लघु कथा): भारती पद्म इमायथूक्कू अप्पाल (निबन्ध) आदि शामिल हैं। तमिल साहित्य में दिए गए उनके महत्वपूर्ण योगदान के लिए उन्हें वर्ष 2002 का ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया। जयकान्तन को साहित्य अकादमी पुरस्कार (1972), सोवियतलैण्ड नेहरू पुरस्कार (1978), साहित्य अकादमी फैलो (1996), पद्म भूषण (2009) आदि से भी सम्मानित किया गया।

गोविन्द विनायक करन्दीकर

सुप्रसिद्ध मराठी कवि, साहित्य आलोचक और अनुवादक गोविन्द विनायक करन्दीकर (1918-2010) को ‘विन्दा करन्दीकर’ नाम से भी जाना जाता है।
उन्होंने यूनानी विद्वान् ‘अरस्तू’ की कविताओं का मराठी में अनुवाद किया था। इसके अलावा उन्होंने सेक्सपियर की कृति ‘किंग लीयर’ का भी मराठी अनुवाद किया था। उनको मराठी साहित्य को दिए गए अमूल्य योगदान के लिए वर्ष 2003 का ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया। उन्हें केथावसुत पुरस्कार, सोवियतलैण्ड नेहरू पुरस्कार, कबीर सम्मान और साहित्य अकादमी फैलोशिप से भी सम्मानित किया गया।

रहमान राही

अब्दुर रहमान राही (1925) कश्मीरी भाषा के सबसे विख्यात साहित्यकार हैं। रहमान राही एक अनुवादक व समालोचक भी हैं। रहमान राही की प्रमुख कृतियों में सना वानी साज, सुखोख सोदा, नवरोज-ए-सबा, कलाम-ए-राही, बाबा फरीद, कहवत, काशीर शारा सोम्बान आदि हैं। रहमान राही को उनके काव्य संग्रह ‘सियाह रूद जायरे मंज’ के लिए वर्ष 2004 का ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया। वह ज्ञानपीठ से सम्मानित होने वाले पहले कश्मीरी साहित्यकार हैं। रहमान राही को साहित्य अकादमी पुरस्कार (1961) और पद्मश्री (2000) से भी सम्मानित किया जा चुका है।

कुँवर नारायण

हिन्दी के सम्मानित कवियों में गिने जाने वाले कुँवर नारायण (1927-2017) को उनकी रचनाशीलता में इतिहास और मिथक के माध्यम से वर्तमान को देखने के लिए जाना जाता है। फैजाबाद (उत्तर प्रदेश) से सम्बन्ध रखने वाले कुँवर नारायण की मुख्य रचनाओं में चक्रव्यूह, तीसरा सप्तक, परिवेश हम-तुम, आत्मजयी, आकारों के आसपास अपने सामने, वाजश्रवा के बहाने, कोई दूसरा नहीं और इन दिनों आदि शामिल है। कुँवर नारायण को वर्ष 2005 का ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया। उनको साहित्य अकादमी पुरस्कार, व्यास सम्मान, कुमार आशान पुरस्कार (केरल) पुरस्कार, तुलसी पुरस्कार, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान पुरस्कार, राष्ट्रीय कबीर सम्मान, पद्म भूषण (2009) आदि सम्मान भी प्राप्त थे।

रवीन्द्र केलकर

रवीन्द्र केलकर (1925-2010) कोंकणी भाषा के सबसे प्रख्यात साहित्यकार थे। आधुनिक कोंकणी आन्दोलन के प्रणेता रवीन्द्र केलकर की कोंकणी भाषा मण्डल की स्थापना में भी अहम भूमिका रही थी। साहित्यकार के अलावा केलकर एक स्वतन्त्रता सेनानी व गाँधीवादी कार्यकर्ता भी थे। रवीन्द्र केलकर की कोंकणी, हिन्दी और मराठी भाषाओं में 32 से अधिक मौलिक पुस्तक प्रकाशित हो चुकी हैं। कोंकणी भाषा साहित्य के दिए गए योगदान के लिए रवीन्द्र केलकर को वर्ष 2006 का ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया। केलकर साहित्य अकादमी पुरस्कार (1976), साहित्य अकादमी फैलोशिप (2007) और पद्मभूषण (2008) से भी सम्मानित किया गया था।

सत्यव्रत शास्त्री

सत्यव्रत शास्त्री (1930) – भारत के एक प्रतिष्ठित संस्कृत विद्वान्, लेखक, कवि और व्याकरणवादी हैं। सत्यव्रत शास्त्री ने महाकाव्यों खण्डकाव्यों, प्रबन्ध काव्य, पत्र काव्य तथा संस्कृत में महत्वपूर्ण लेखन कार्य किए हैं। इनके महत्वपूर्ण कार्यों में रामकीर्तिमहाकाव्यम, वृहत्तमभारतम्, श्री बोधिसत्वचरितम् वैदिक व्याकरण, समन्यदेशा सूत्रम् विभति आदि शामिल हैं। इन्हें संस्कृत भाषा के संवर्द्धन हेतु इनके योगदान के लिए वर्ष 2006 का ज्ञानपीठ पुरस्कार संयुक्त रूप से प्रदान किया गया। सत्यव्रत शास्त्री को साहित्य अकादमी पुरस्कार (1968), पद्मश्री (1999), पद्म भूषण (2010) आदि प्रतिष्ठित सम्मान भी दिए जा चुके हैं।

ओएनवी कुरूप

ओट्टपलाक्कल नीलकण्ठन वेलु कुरूप (1931-2016) एक विख्यात मलयाली कवि व गीतकार थे। उनका पहला काव्य संग्रह ‘पोरूटुन्ना सौन्दर्यम्’ वर्ष 1949 में प्रकाशित हुआ। उनकी मुख्य कृतियों में मरुभूमि, अक्षरम, दाहिकुन्ना पानापाथरम, नीलक्कन्नूकल, अग्नि शलमंगल, करूथा पक्षियुदे पाट्टू, मृम्या, दज्जिमनि, वेरुथे, स्वयंवरम, सूर्यगीतम् आदि शामिल हैं। मलयालम साहित्य में उनके समग्र योगदान के लिए उन्हें वर्ष 2007 का ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया। उनको केरल साहित्य अकादमी पुरस्कार (1975), सोवियत लैण्ड नेहरू पुरस्कार (1981), पद्मश्री (1998) और पद्म भूषण (2011) पुरस्कारों से भी सम्मानित किया गया।

अखलाक मोहम्मद खान ‘शहरयार’

अखलाक मोहम्मद खान (1936-2012) आधुनिक उर्दू कवियों और गीतकारों में से एक थे। वह ‘शहरयार’ नाम से उर्दू कविता लिखते थे। हिन्दी फिल्म गीतकार के रूप में शहरयार को गमन (1978) और उमराव जान (1981) में उनके गीतों के लिए सबसे अधिक जाना जाता है। शहरयार की प्रमुख कृतियों में इज्म-ए-आजम, हिज्र के मौसम, ख्वाब के दर बन्द हैं, नींद की किचें, दूध की रोशनी आदि शामिल हैं। उर्दू शायरी (कविता) में उनके योगदान के लिए शहरयार को वर्ष 2008 का ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया।

अमरकान्त

भारत के प्रसिद्ध साहित्यकारों में से एक अमरकान्त (1925-2014) हिन्दी कथा साहित्य में प्रेमचन्द के बाद यथार्थवादी धारा के प्रमुख कहानीकार थे। अमरकान्त की प्रमुख कृतियों में जिन्दगी और जोंक, देश के लोग, मौत का नगर मित्र मिलन, कुहासा तूफान, आकाश पक्षी, काले उजले दिन, कँटीली राह के फूल, ग्राम सेविका, सुखजीवी, बीच की दीवार (उपन्यास), कुछ यादें कुछ बातें, बानर सेना, एक स्त्री का सफर (प्रकीर्ण साहित्य) आदि शामिल हैं। हिन्दी कथा साहित्य में उनके समग्र योगदान के लिए उन्हें वर्ष 2009 का ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया। साहित्य अकादमी सम्मान (2007) व व्यास सम्मान (2010) आदि सम्मान प्राप्त थे।

श्रीलाल शुक्ल

श्रीलाल शुक्ल (1925-2011) समकालीन कथा-साहित्य मे उद्देश्यपूर्ण व्यंग्य लेखन के लिए प्रसिद्ध थे। श्रीलाल शुक्ल अंग्रेजी, उर्दू, संस्कृत और हिन्दी भाषा के विद्वान् थे। उनका पहला उपन्यास सूनी घाटी का सूरज’ वर्ष 1957 में प्रकाशित हुआ था। हिन्दी साहित्य में उनके अमूल्य योगदान के लिए उन्हें वर्ष 2009 का ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया। उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार (1970), व्यास सम्मान (1999), यश भारती (2005), पद्मभूषण (2008) तथा लोहिया सम्मान, मैथिलीशरण गुप्त सम्मान, शरद जोशी सम्मान (2009) आदि भी प्रदान किए गए।

चन्द्रशेखर कम्बार

चन्द्रशेखर कम्बार (1937-) एक आधुनिक कन्नड़ उपन्यासकार, नाटककार और शिक्षाविद हैं। चन्द्रशेखर कम्बार ने कन्नड़ भाषा की फिल्मों का निर्देशन भी किया है। युनिवर्सिटी ऑफ शिकागो में अध्यापन कार्य करने वाले चन्द्रशेखर कम्बार हम्पी में कन्नड़ विश्वविद्यालय के संस्थापक कुलपति भी रह चुके हैं। कन्नड़ साहित्य में अमूल्य योगदान के लिए कम्बार को वर्ष 2010 का ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया। कम्बार को संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1983), कर्नाटक अकादमी पुरस्कार (1987), साहित्य अकादमी पुरस्कार (1991), पद्मश्री (2001), सन्त कबीर पुरस्कार (2002) आदि से भी सम्मानित किया गया।

प्रतिभा राय

प्रतिभा राय (1943) ओडिया भाषा की प्रसिद्ध लेखिका है। प्रतिभा राय ने अपने उपन्यासों के माध्यम से सामाजिक अन्याय और भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज बुलन्द की इनकी प्रमुख कृतियों में मगनमति, यज्ञनासैनी, शिलापदम, महामोह, अधिभूमि, उत्तर मार्ग, उल्लंघन, द्रौपदी, अरण्य, मोक्ष, हरितपत्र आदि शामिल हैं। ‘यक्षनासैनी’ उपन्यास के लिए डॉ. प्रतिभा राय को वर्ष 2011 का ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया। इनको झंकार पुरस्कार (1988) मूर्तिदेवी पुरस्कार (1991), ओडिशा साहित्य अकादमी पुरस्कार (1986), साहित्य अकादमी पुरस्कार (2000), पदमश्री (2007) आदि से भी सम्मानित किया जा चुका है।

रावुरि भारद्वाज

रावुरी भारद्वाज (1927-2013) एक विख्यात तेलुगु उपन्यासकार, लघु-कथा लेखक, कवि और समीक्षक थे। तेलुगू के शीर्षस्थ कथाकार रावुरि भारद्वाज मनुष्य जीवन की संवेदनशील अभिव्यक्ति के लिए विख्यात थे। रावुरि भारद्वाज के कहानी संग्रह, उपन्यास, बच्चों के लिए लघु उपन्यास और नाटक प्रकाशित हुए। तेलुगू साहित्य में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें वर्ष 2012 का ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया।

केदारनाथ सिंह

केदारनाथ सिंह (1934-2018) हिन्दी के सुप्रसिद्ध कवि व साहित्यकार थे। उनकी कविताओं के अनुवाद लगभग सभी प्रमुख भारतीय भाषाओं के अलावा अंग्रेजी स्पैनिश, रूसी, जर्मन और हंगेरियन आदि विदेशी भाषाओं में भी हुए हैं। हिन्दी साहित्य में उल्लेखनीय योगदान के लिए केदारनाथ सिंह को वर्ष 2013 का ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया। उनको साहित्य अकादमी पुरस्कार, व्यास सम्मान आदि से भी सम्मानित किया गया।

भालचन्द्र नेमाडे

भालचन्द्र नेमाडे (1938) एक मराठी लेखक, उपन्यासकार, कवि, समीक्षक और शिक्षाविद हैं। भालचन्द्र नेमाडे 60 के दशक के लघु पत्रिका आन्दोलन के प्रमुख हस्ताक्षर थे, उनके साहित्य में देशीवाद (स्वदेशीकरण) की झलक मिलती है। भालचन्द्र नेमाडे की प्रमुख कृतियों में हिन्दू जगण्याची समृद्ध अडगल, बिढार, हूल, जहरीला झूल (उपन्यास), मेलडी, देखणी (काव्य) और टीक्का स्वयंवर, साहित्यची भाषा, तुकाराम (आलोचना) आदि शामिल हैं। मराठी साहित्य में समग्र योगदान के लिए नेमाडे को वर्ष 2014 का ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त हुआ। इसके अलावा इन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार और पद्मश्री (2011) से भी सम्मानित किया जा चुका है।

रघुवीर चौधरी

गुजराती भाषा के प्रसिद्ध उपन्यासकार, कवि, आलोचक और गाँधीवादी रघुवीर चौधरी (1938-) ने गुजराती के अलावा हिन्दी में भी लेखन कार्य किया है। गुजरात विश्वविद्यालय में अध्यापन कर चुके रघुवीर चौधरी की रचना ‘रूद्र महालय’ को गुजराती साहित्य की अमूल्य धरोहर माना जाता है। वह अनेक समाचार-पत्रों में स्तम्भ लेखन भी करते हैं। इन्हें गुजराती साहित्य को अमूल्य योगदान के लिए वर्ष 2015 का ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया। रघुवीर चौधरी को साहित्य अकादमी पुरस्कार (1977), रंजीतराम सुवर्ण चन्द्रक (1975), साहित्य गौरव पुरस्कार (2001), कुमार चन्द्रक (1965) आदि सम्मान भी दिए जा चुके हैं।

शंख घोष

शंख घोष (1932) एक बंगाली भारतीय कवि एवं आलोचक हैं। बंगाली भाषा के सबसे प्रभावशाली लेखकों में से एक शंख घोष को रबिन्द्रनाथ पर एक प्रमुख लेखक माना जाता है। उन्होंने कोलकाता में बंगबासी कॉलेज, सिटी कॉलेज और जाधवपुर विश्वविद्यालय सहित कई शैक्षिक संस्थानों में अध्यापन कार्य किया। बंगाली साहित्य में इनके योगदान के लिए इन्हें वर्ष 2016 का ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया। इन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार (1977), सरस्वती सम्मान, पद्म भूषण (2011) आदि से भी सम्मानित किया जा चुका है।

कृष्णा सोबती

कृष्णा सोबती (1925) ने हिन्दी की कथा-भाषा को अपनी विलक्षण प्रतिभा से अप्रतिम ताजगी और स्फूर्ति प्रदान की है। इन्हें अपनी साफ-सुथरी रचनात्मकता और अभिव्यक्ति के लिए जाना जाता है। इनकी पहली रचना ‘लामा’ वर्ष 1950 में प्रकाशित हुई। कृष्णा सोबती की प्रमुख कृतियों में डार से बिछुरी, मित्रो मरजानी, सूरजमुखी अंधेरे के, जिन्दगीनामा, यारों के यार, दिलो- दानिश और बादलों के घेरे मेरी माँ कहाँ. सिक्का बदल गया आदि शामिल हैं। कृष्णा सोबती को हिन्दी साहित्य में दिए गए योगदान के लिए वर्ष 2017 का ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया। इसके अलावा साहित्य अकादमी पुरस्कार (1980), साहित्य शिरोमणि सम्मान, पद्म भूषण (2010) आदि से भी सम्मानित किया जा चुका है।

अमिताव घोष

अमिताव घोष (1956) अंग्रेजी भाषा के लेखक और उपन्यासकार है | उन्हें ‘द नटमेग’स कर्स: पैरेबल्स फॉर ए प्लैनेट इन क्राइसिस (The Nutmeg’s Curse: Parables for a Planet in Crisis)’ के लिए वर्ष 2018 का ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया।

अक्कितम अच्युतन नंबूथिरी

अक्कितम अच्युतन नंबूथिरी (1926 -2020) – का जन्म 8 मार्च 1926 को केरल के पलक्कड़ जिले में हुआ था | मलयालम भाषा के लिए इन्हें वर्ष 2019 ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया |

नीलमणि फूकन (कनिष्ठ)

नीलमणि फूकन (1933) असमिया भाषा के विख्यात साहित्यकार हैं उन्हें वर्ष 2020 में ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया |

दामोदर मौउजो

दामोदर मौउजो (1944) कोंकणी भाषा के उपन्यासकार, कथाकार, आलोचक और निबन्धकार हैं उन्हें वर्ष 2021 में ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया |

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