चन्द्रगुप्त मौर्य का जीवन परिचय – Chandragupta Maurya Biography in Hindi

चंद्रगुप्त मौर्य अपनी गुरु विष्णुगुप्त अथवा चाणक्य की सहायता से नंद वंश के अंतिम शासक धनानंद को हराकर मौर्य साम्राज्य की स्थापना की | मगध के राज सिंहासन पर बैठकर चंद्रगुप्त मौर्य ने एक ऐसे साम्राज्य की नीव डाली जो संपूर्ण भारत में फैला था चंद्रगुप्त के विषय में जस्टिन का कथन है की उसने (चंद्रगुप्त ने) छः लाख की सेना लेकर संपूर्ण भारत को रौंद डाला और उस पर अपना अधिकार कर लिया |

चंद्रगुप्त मौर्य ने उत्तरी-पश्चिमी भारत को सिकंदर के उत्तराधिकारियों से मुक्त कर नंदू का उन्मूलन कर सेल्यूकस को पराजित कर संघ के लिए विवश कर जिस साम्राज्य की स्थापना की उसकी सीमाएं उत्तर पश्चिम में ईरान की सीमा से लेकर दक्षिण में वर्त उत्तरी कर्नाटक एवं पूर्व में मगद से लेकर पश्चिम में सोपारा तक सुराष्ट्र तक फैली हुई थी महावंश की टीका में उसे शकल जम्बूदीप का शासक कहा गया है|

चन्द्रगुप्त मौर्य का जीवन परिचय

रुद्रदामन ने जूनागढ़ अभिलेख से पता चलता है कि चंद्रगुप्त का साम्राज्य विस्तर पश्चिमी भारत में भी था इसी में चंद्रगुप्त के गवर्नर पुष्यगुप्त का वर्णन है| जिसने सुदर्शन झील का निर्माण कराया था महाराष्ट्र के थाने जिले में सोपारा में स्थित अशोक के शिलालेख से यह पता चलता है| की चंद्रगुप्त ने सौराष्ट्र की सीमाओं से परे पश्चिमी भारत की अपनी विजय को कोकण विस्तार किया था

चन्द्रगुप्त मौर्य (322 से 298 ई0 पू॰) – का इतिहास व जीवन परिचय

Table of Content

नाम चन्द्रगुप्त मौर्य
जन्म 340 ईसा पूर्व
जन्म – स्थान पाटलिपुत्र ( बिहार )
मृत्यु 297 ईसा पूर्व
मृत्यु स्थान श्रवणबेलगोला (कर्नाटक)
पत्नी दुर्धरा और हेलेना
पूरा नाम चक्रवर्ती सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य
पुत्र बिन्दुसार  मौर्य
पिता का नाम सूर्यगुप्त स्वार्थसिद्धि मौर्य
माता का नाम मुरा

चन्द्रगुप्त मौर्य का जीवन परिचय – Chandragupta Maurya Biography in Hindi

प्रारम्भिक जीवन— चन्द्रगुप्त मौर्य की गणना भारत के महानतम् शासकों में की जाती है। डा॰ राधाकुमुद मुखर्जी के अनुसार, “चन्द्रगुप्त की महानता कई बातों में अद्वितीय है। ………भारत के बहुत ही थोड़े शासकों को इस बात का श्रेय प्राप्त है कि उन्होंने अपने इतने छोटे-से शासनकाल में (पुराणों के अनुसार 24 वर्ष) इतनी अधिक सफलतायें प्राप्त की हों।

” चन्द्रगुप्त मौर्य एक साधारण स्थिति से उत्थित होकर साम्राज्य का स्वामी बना था। जैन, बौद्ध एवं ब्राह्मण साहित्य में वर्णित कहानियों के आधार पर चन्द्रगुप्त का प्रारम्भिक जीवन साधारण एवं कष्टसाध्य था और वह किशोरावस्था में ही आचार्य चाणक्य के सम्पर्क में आया। चाणक्य तक्षशिला का निवासी था और शस्त्र का प्राकाण्ड पण्डित था। चाणक्य एवं चन्द्रगुप्त का सम्पर्क एक एतिहासिक सच्चाई है, क्योंकि सभी भारतीय साक्ष्य चाणक्य चन्द्रगुप्त के निलन का एक स्वर में उल्लेख करते हैं।

 

कहते हैं कि मगध के राजा नन्द के यहाँ चाणक्य उच्च पद पर था, परन्तु एक बार राजा नन्द से अपमानित होने के कारण वह मगध से भाग गया। चाणक्य ने नन्द वंश को समूल नष्ट करने की प्रतिज्ञा ली। नन्द वंश के चन्द्रगुप्त से चाणक्य का सम्पर्क बढ़ा और दोनों ने नन्दवंश के विनाश की तैयारी की।

चन्द्रगुप्त मौर्य की उपलब्धियाँ

इस विषय में इतिहासकारों में मतभेद है कि चन्द्रगुप्त ने अपने साम्राज्य निर्माण की शुरुआत कहाँ से की। उसने पहले विदेशी यूनानियों को देश से बाहर किया। यह पहले नन्दराज को परास्त कर मगध का राज्य पर प्राप्त किया।

इसका निश्चित साक्ष्य उपलब्ध नहीं है। परन्तु बौद्ध साक्ष्यों एवं यूनानी विवरणों के सूक्ष्म अनुशीलन से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि प्रथमत: सीमान्त के छोटे-छोटे राज्यों के डाकू एवं वीर लोंगो को संगठित किया, जिसमें चाणक्य ने उसकी सहायता की।

(1) पंजाब पर विजय


सिकन्दर की मृत्यु (323 ई० पू०) के बाद सिन्ध तथा पंजाब के यूनानी शासक आपस में लड़ने लगे। यूनानियों की शक्ति क्षीण हो गयी। वहाँ स्थानीय जनता स्वन्त्रता से लिये छटपटाने लगी। चन्द्रगुप्त ने इन सभी परिस्थितियोँ का पूरा लाभ उठाया। यूनानी इतिहास लेखक जस्टिन के अनुसार, “सिकन्दर के बाद पश्चिमोत्तर भारत ने गुलामी को उतार फेंकने के लिये यनानी शासकों का वध कर दिया। इस स्वन्त्रता संग्राम का नेता चन्द्रगुप्त था।” अत: 317 ई० पू० तक सिन्ध तथा पंजाब पर चन्द्रगुप्त ने विजय प्राप्त की।

(2) नन्दवंश का विनाश एवं मगध पर अधिकार


पंजाब और सिन्ध के बाद चन्द्रगुप्त मौर्य ने मगध को जीता। उसकी मगध विजय का विस्तृत विवरण अभी तक उपलब्ध नहीं हो पाया है। अभी तक उपलब्ध समस्त भारतीय साक्ष्य यह तो स्पष्ट रूप से घोषित करते हैं कि चाणक्य ने नन्दों का विनाश करके चन्द्रगुप्त मौर्य को मगध के सिंहासन पर बैठाया, परन्तु वे चन्द्रगुप्त के आक्रमण का ब्यौरा नहीं देते।

जैसा कि हमको मालूम हे कि नन्दों के पास एक विशाल सेना थी, नन्दों को सिंहासन से हटाने के लिये निश्चय ही भयंकर युद्ध लड़ा गया होगा। मुद्राराक्षस नाटक में जिस ढंग से षड्यंत्रों एवं गुप्त मन्त्रणाओँ को महत्व दिया गया, उससे भी अनुमान लगाया जा सकता है कि इस युद्ध में सैनिक शक्ति के साथ-साथ साम, दाम, दण्ड और भेद की कूटनीति की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही होगी। मगध-विजय में चाणक्य का प्रमुख हाथ रहा।

(3) सेल्यूकस की पराजय और ईरान तक राज्य विस्तार


सिकनदर की  मृत्यु के बाद उसके साम्राज्य पर अधिकार करने के लिये उसके प्रमुख सेनापतियों सेल्यूकस और एण्टिगोनस के मध्य एक गृह-युद्ध आरम्भ हुआ, जिसमें एक लम्बे युद्ध के बाद सेल्यूकस विजयी हुआ और वह बेबीलोन एवं बैक्ट्रिया सहित सम्पूर्ण एशियाई यूनानी साम्राज्य का अधिपति हो गया। इन क्षेत्रों में अपनी स्थिति सुदृढ़ करने के बाद लगभग 306 ई० पू० में सेल्यूकस ने अपना राज्याभिषेक किया और ‘निकेटर’ (विजेता) की उपाधि धारण की।

इसके बाद उसने भारत विजय की योजना बनायी। इस समय भारत पर चन्द्रगुप्त मौर्य का प्रभुत्व कायम हो चुका था। चन्द्रगुप्त अभी तक अविजित था और चाणक्य जैसा कूटनीतिज्ञ उसकी शासन व्यवस्था की बागडोर सँभाले हुए था। सेल्यूकस एवं चन्द्रगुप्त में संघर्ष हुआ, जिसमें सेल्यूकस पराजित हुआ। सेल्यूकस ने चन्द्रगुप्त से सन्धि कर ली जिसके अनुसार एरिया (हिरात), अराकोसिया (कंधार), पैरोपेनिसेडाई (काबुल) और जैड्रोसिया (बलूचिस्तान) के प्रदेश चन्द्रगुप्त को देने पड़े।

चन्द्रगुप्त ने इसके बदले में सेल्यूकस को 500 हाथी प्रदान किये। सन्धि को सुदृढ़ और स्थायी बनाने के लिये सेल्यूकस ने बदले में अपनी कन्या हेलन का विवाह भी चन्द्रगुप्त के साथ कर दिया। चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में सेल्यूकस के राजदूत मेगस्थनीज की उपस्थिति इसी निर्णय का परिणाम थी। निश्चय ही चन्द्रगुप्त की सेल्यूकस पर विजय अपूर्व थी। इसके परिणामस्वरूप भारत की सीमायें ईरान से छूने लगी थी। पशचिमोत्तर इतिहास में पहली बार  भारत ने अपनी प्राकृतिक सीमायें प्राप्त कीं और हिन्दूकुश पर्वत तक भारत का साम्राज्य फैल गया था।

(4) पश्चिमी भारत पर विजय


चन्द्रगुप्त मौर्य ने पश्चिमी भारत पर विजय प्राप्त की थी, इसमें कोई संशय नहीं है। रुद्रदामन के शिलालेख से ज्ञात होता है कि चन्द्रगुप्त मौर्य के प्रान्तीय शासक पुष्यगुप्त ने सौराष्ट्र में प्रसिद्ध सुदर्शन झील का निर्माण कराया था। सौराष्ट्र की विजय के परिणामस्वरूप मालवा व उज्जैन पर भी उसका अधिकार हो गया था। मुम्बई के सोपारा नामक स्थान से प्राप्त अशोक के शिलालेख से ज्ञात होता है कि सोपारा भी चन्द्रगुप्त के अधीन रहा था।

(5) दक्षिण विजय


चन्द्रगुप्त ने अपने शासन के अन्तिम दिनों दक्षिण भारत पर विजय की थी, किन्तु डॉ० आयंकर दक्षिण विजय का श्रेय चन्द्रगुप्त को नहीं वरन् बिन्दुसार को देते हैं। इतिहासिक साक्ष्यों जैसे मुद्राराक्षस चन्द्रगिरि अभिलेख, जैन ग्रन्थ तथा प्लूटार्क के विवरण से ज्ञात होता है कि चन्द्रगुप्त ने दक्षिण भारत पर आक्रमण कर उसे अपने साम्राज्य में मिला लिया था। प्लूटार्क के इस कथन में, “उसने छ: लाख सैनिकों की सेना लेकर सम्पूर्ण भारत को अपने अधीन कर लिया।

” चन्द्रगुप्त की दिग्विजय की ध्वनि सुनायी देती है, क्योंकि यह इतिहासिक सच्चाई है कि अशोक ने सिवाय कलिंग विजय के अलावा अन्य विजय प्राप्त नहीं की और बिन्दुसार की किसी विजय का उल्लेख नहीं मिलता है। जैन साक्ष्यों में भी चन्द्रगुप्त द्वारा अन्तिम दिनों में जैन धर्म स्वीकारने एवं भद्रबाहु के साथ दक्षिण में मैसूर राज्य के ‘श्रवणबेलागोला’ (कर्नाटक) में जाकर रहने के उल्लेख मिलते हैं।

निर्ष्कषत: यह कहा जा सकता है कि चन्द्रगुप्त मौर्य का साम्राज्य हिन्दूकुश से लेकर बंगाल तक और हिमालय से लेकर कर्नाटक तक विस्तृत था। इसके अन्तर्गत अफगानिस्तान और बलूचिस्तान के विशाल प्रदेश, पंजाब, सिन्धु, कश्मीर, नेपाल, गंगा-यमुना का दोआब, मगध, बंगाल, सौराष्ट्र, मालवा और दक्षिण भारत में कर्नाटक तक का प्रदेश सम्मिलित था।

चन्द्रगुप्त मौर्य का शासन-प्रबन्ध

चन्द्रगुप्त मौर्य एक महान् विजेता ही नहीं वरन् कुशल शासन-प्रबन्धक भी था। कौटिल्य के ‘अर्थशास्त्र’, यूनानी राजदूत मेगस्थनीज द्वारा लिखित ‘इण्डिकाֹ नामक पुस्तक से उसके शासन-प्रबन्ध की विस्तृत जानकारी मिलती है।

केन्द्रीय शासन

सम्राट की शक्ति अपार थी, सर्वोच्च सत्ता उसी में निहित थी। प्रान्तों के शासकों की नियुक्ति वही करता था। शासन की सर्वोच्च शक्तियाँ व्यवस्थापिका, न्यायपालिका एवं कार्यपालिका उसी में विद्यमान थीं, परन्तु उसका शासन उदार-नरंकुशवाद पर आधारित था। स्वेच्छाचारी होते हुए भी धर्मशास्त्र नीतिशास्त्र एवं मन्त्रिपरिषद् की भावनों का वह आदर करता था।

 

  1. मन्त्रि-परिषद्— राजा को परामर्श देने के लिये एक मन्त्रि-परिषद् थी। कौटिल्य के अर्थशास्त्र के अनुसार मन्त्रि-परिषद् में 18 मंत्री होते थे। केन्द्रीय शासन को 27 विभागों में विभक्त किया गया था। प्रत्येक विभाग एक अलग विभागाध्यक्ष होता था, जिसकी नियुक्ति स्वयं सम्राट करता था। 3-4 प्रमुख अधिकारियों की एक सलाहकार समिति भी होती थी जो ‘मन्त्रिण:’ कहलाती थी। इसमें अमात्य, महासंधिविग्रहक, विदेशमन्त्री, कोषाध्यक्ष, दण्डपालक, आदि थे। प्रत्येक मन्त्रिण का वेतन 48,000 पण होता था।
  2. न्याय व्यवस्था— किसी भी राज्य की उन्नति एवं स्थायित्व उचित न्याय व्यवस्था पर आधारित होता है। चन्द्रगुप्त मौर्य ने न्याय व्यवस्था की ओर समुचित ध्यान दिया। गाँवों के मामलों का फैसला ग्राम पंचायतें करती थीं। ग्रामों तथा नगरों के लिये अलग-अलग न्यायलय थे। न्यायलय के दो प्रकार के होते थे— फौजदारी एवं दीवानी। दण्ड  व्यवस्था बहुत कठोर थी। आर्थिक दण्ड से लेकर अंग-भंग तथा प्राण दण्ड तक  दिये जाते थे। फलत: समाज में अपराध प्राय: समाप्त हो गये। सम्राट सबसे बड़ा न्यायाधीश होता था।
  3. सैनिक व्यवस्था— कोई भी राज्य बिना विशाल सेना के टिक नहीं सकता। चन्द्रगुप्त ने साम्राज्य की सुरक्षा के लिये विशाल सेना का गठन किया। सैनिकों को केन्द्रीय सरकार की ओर से नकद नियमित वेतन मिलता था। मेगस्थनीज व अन्य साक्ष्यों के अनुसार चन्द्रगुप्त की सेना में 6 लाख पैदल सैनिक, 30 हजार घुड़सवार, 9 हजार हाथी और 8 हजार रथ थे। सेना के प्रबन्ध के लिये एक सैनिक विभाग होता था, जो 6 समितियों में विभाजित था। ये समितियाँ, जल-सेना, पैदल-सेना, घुड़सवार-सेना, रथसेना, गजसेना तथा यातायात की देखभाल करती थीं और युद्ध सामग्री की व्यवस्था करती थीं। प्रत्येक समिति में 5 सदस्य होते थे।
  4. गुप्तचर व्यवस्था— कौटिल्य के अनुसार गुप्तचर राजा के नेत्र होते हैं। राज्य की प्रत्येक घटना की जानकारी के लिये साम्राज्य में गुप्तचरों का जाल फैला हुआ था। स्त्रियाँ भी गुप्तचर का काम करती थीं। ये गुप्तचर सरकारी कर्मचारियों के कार्यों एवं जनता के विचारों को राजा तक पहुँचाते थे। गुप्तचर दो दर्ग में होते थे— (1) संस्थिल, (2) सथारण। संस्थिल वर्ग के गुप्तचर एक स्थान पर रहते थे और संथारण गुप्तचर भ्रमण किया करते थे।
  5. अर्थव्यवस्था— चन्द्रगुप्त के राज्य की आर्थिक स्थिति बहुत ही सुदृढ़ थी। राजकीय आय के अनेक स्रोत थे, परन्तु कृषिकर आय का मुख्य साधन था। उपज का 1/6 भाग कर के रूप में लिया जाता था। बिक्रीकर, जुर्माने, खानों, चरागाहों, जंगलों के कर आदि सभी से राज्य की आय होती थी।

 

सबसे सहत्वपूर्ण बात यह थी कि राज्य करों की आय का अधिकांश भाग जनता के हित के लिये खर्च किया करता था। चिकित्सालय, अनाथालय, विद्यालय, भवनों के निर्माण , वृद्धों एवं किसानों की सहायता, सेना तथा न्याय विभाग का व्यय, राज्य की ओर से किया जाता था। सिंचाई की व्यवस्था भी राजकीय कोष से होती थी।

प्रान्तीय शासन

सम्भवतया शासन की सुविधा के लिये समस्त राज्य को छ: प्रान्तों में विभक्त किया गया था। यह विभाजन निम्न प्रकार से था।—

  1. उत्तरापथ, इसकी राजधानी तक्षशिला थी।
  2. सेल्यूकस से प्राप्त प्रदेश, इसकी राजधानी कपिला थी।
  3. सौराष्ट्र, इसकी राजधानी गिरनार थी।
  4. दक्षिणापथ (कर्नाटक), इसकी राजधानी स्वर्णगिरि थी।
  5. अवन्ति (मालवा) इसकी राजधानी उज्जयिनी थी।
  6. मगध एवं निकटवर्ती प्रदेश, जिसकी राजधानी पाटलिपुत्र थी। सम्राट स्वयं यहाँ का शासन चलाता था।

चन्द्रगुप्त मौर्य का नगर व्यवस्था

मेगस्थनीज के अनुसार राजधानी पाटलिपुत्र बहुत बड़ा नगर था, जिसकी व्यवस्था जनतन्त्रीय प्रणाली से होती थी। सोन व गंगा के तट पर बसा नगर पाटलिपुत्र लगभग 16 किमी लम्बा एवं 3 किमी चौड़ा था। नगर की सुरक्षा के लिये चारों ओर 600 फुट चौड़ी तथा 60 फुट गहरी खाई थी जो शहर की गन्दगी बहाने के भी काम आती थी।

नगर के चारों ओर लकड़ी की प्राचीर थी, जिसमें 570 मीनारें एवं 64 द्वार बने हुए थे। पटना के निकट कुम्हार गाँव में प्राचीन पाटलिपुत्र के अवशेष प्राप्त हुए हैं। सुन्दरता तथा रमणीयता में चन्द्रगुप्त के राजभवन ईरान के राजप्रासादों से भी अधिक सुन्दर थे। पाटलिपुत्र की व्यवस्था के लिये निम्नलिखित छ: समितियाँ कार्य करती थीं—

  1. शिल्पकला समिति— यह समिति औद्योगिक वस्तुओं की शुद्धता, निरीक्षण, पारिश्रमिक निर्माण तथा शिल्पियों एवं कलाकारों के हितों की रक्षा करती थ। शिल्पी को अपाहिज एवं बेकार करने वाले को राज्य प्राण दण्ड देता था।
  2. वैदेशिक समिति— यह समिति विदेशी यात्रियों की गतिविधियों का पूरा ध्यान रखती थी। राज्य की ओर से ठहरने की व्यवस्था एवं इनकी सुरक्षा तथा चिकित्सा का प्रबन्ध भी यह समित करती थी। मृत्यु होने पर रारकीय व्यय से अन्त्येष्टि की जाती थी और उसकी सम्पत्ति उनके उत्तराधिकायों को लौटा दी जाती थी।
  3. जनसंख्या समिति—  यह समिति नगर में जन्म-मरण का लेखा-जोखा करती थी। इससे कर निर्धारण में सुविधा रहती थी। यह कार्य आजकल की नगरपालिका भी करती है।
  4. वाणिज्यिक समिति— इस समिति का काम नाप-तौल की जाँच करना, वस्तुओं के भाव निश्चित करना तथा तौलने के बाँटों का निरन्तर निरीक्षण करना था।
  5. औद्य़ोगिक समिति— यह समिति कारखानों में तैयार माल की जाँच करना, उसकी बिक्री के लिये बाजार तैयार करना तथा नयी-पुरानी वस्तुओं का अलग-अलग मूल्य निर्धारण का काम करती थी। मिलावट करने वाले को राज्य की ओर से प्राण-दण्ड दिया जाता था।
  6. कर समिति— वस्तुओं पर विक्रय कर यही समिति लेती थी। मूल्य पर दस प्रतिशत कर लिया जाता था। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में कर समिति के कार्यों का विशद् वर्णन है। नगर का अधिकारी ‘नागरिक’ कहलाता था। ‘गोप’ और ‘स्थानिक’ उसकी सहायता करते थे। सार्वजनिक कार्यों के लिये सभी समितियाँ मिलकर काम करती थीं। 

चन्द्रगुप्त मौर्य का ग्राम प्रशासन

ग्राम, शासन की सबसे छोटी इकाई थी। ग्रामों का शासन पंचायतें चलाती थीं जिनके सदस्यों का चुनाव गाँव के लोग करते थे। इन पंचायतों के प्रमुख ग्रामिक की नियुक्ति राज्य द्वारा की जाती थी। इसको राज्य की ओर से वेतन भी दिया जाता था। ग्राम पंचायतें गाँव के विकास के लिये अपनी योजना बनाती थीं. गाँव में सिंचाई की व्यवस्था करना तथा यातायात प्रबन्ध करना इन्हीं का काम था।

चन्द्रगुप्त मौर्य का व्यक्तित्व

सम्राट चन्द्रगुप्त महत्वाकांक्षी शासक था। उसका जीवन भी शान-शौकत का था। वह सुन्दर पालकी में बैठता था। केवल चार अवसरों पर ही जनता को राजा के दर्शनों का अवसर मिलता था। ये अवसर थे—युद्ध, यात्रा, यज्ञानुष्ठान और न्यायालय में।

आखेट के समय राजा की सुरक्षा के लिये कड़े प्रबन्ध किये जाते थे। महिला अंगरक्षक रखी जाती थी तथा सुरक्षा की दृष्टि से शयन का कमरा प्रति रात्रि बदला जाता था। राजा अपना अधिकांश समय राजकाज में ही लगाता था। उसे आखेट, घुड़दौड़, पशुओँ की लड़ाई तथा मल्ल-युद्ध देखने का बहुत शौक था।

चन्द्रगुप्त मौर्य का इतिहास में स्थान

भारतीय इतिहास में चन्द्रगुप्त मौर्य का सहत्वपूर्ण स्थान है। वह एक महान् विजेता एवं कुशल प्रशासक था। भारत की राजनीतिक एकता का प्रयास करने वाला वह प्रथम सम्राट था। इतना ही नहीं उसने भारतीय प्रदेशों से यूनानी शासकों को खदेड़ कर भारत के गौरव को बढ़ाया। आवागमन के साधनों का अभाव होते हुए भी चन्द्रगुप्त ने दक्षिण भारत के राज्यों पर अधिकार किया।

वह प्रथम उत्तरी भारत का सम्राट था, जिसने दक्षिण के राज्यों को स्वायत्त शासन प्रदान कर अपनी दूरदर्शिता का परिचय दिया। प्रजा की भलाई के लिये उसने अनेक कार्य किये। व्यापार और कृषि की उन्नत उसके शासनकाल में खूब हुई। वह कला प्रेमी था और सुदृढ़ केन्द्रीय शासन की स्थापना कर उसने भारत को एकता के सूत्र में बाँधने का प्रयास किया।

इसी दृष्टि से हम उसे राष्ट्र निर्माता कह सकते हैं। शासन प्रबन्ध की दृष्टि से वह भारत का प्रथम सुयोग्य शासक था। आगे आने वाले सभी हिन्दू व मुस्लिम शासकों ने उसकी शासन विधि को ही अपनाया। इस सम्बन्ध में इतिहासकार विन्सेन्ट स्मिथ  का कथन सत्य प्रतीत होता है।

वह लिखता है, “मौर्य साम्राज्य की अवस्था के सम्बन्ध में उपलब्ध विवरण से मेरे मन पर यह प्रभाव पड़ता है कि मौर्य साम्राज्य का शासन प्रबन्ध अकबर के शासन प्रबन्ध से कहीं अच्छा था।” मेगस्थनीज ने चन्द्रगुप्त मौर्य के शासन की मुक्त कण्ठ से प्रशंसा की है।

 

चंद्रगुप्त मौर्य से जुड़े कुछ सवाल और उनके जवाब :-

प्रश्न 1 :- चंद्रगुप्त मौर्य के पिता का क्या नाम था ?

उत्तर – चंद्रगुप्त मौर्य के पिता का नाम सूर्यगुप्त स्वार्थसिद्धि मौर्य था |

प्रश्न 2 :- चंद्रगुप्त मौर्य का पुत्र कौन था ?

उत्तर – चंद्रगुप्त मौर्य का पुत्र बिन्दुसार था |

प्रश्न 2 :- मौर्य साम्राज्य की स्थापना किसने की थी ?

उत्तर – मौर्य साम्राज्य की स्थापना चंद्रगुप्त मौर्य ने की थी |

 

 

 

इस पोस्ट में हमने जाना चंद्रगुप्त मौर्य के जीवन के बारे में , चन्द्रगुप्त मौर्य की उपलब्धियाँ,चन्द्रगुप्त मौर्य का शासन-प्रबन्ध,चन्द्रगुप्त मौर्य का नगर व्यवस्था,चन्द्रगुप्त मौर्य का व्यक्तित्व इत्यादि के बारे में | उम्मीद करता हु आपको ये जानकारी पसंद आई होगी |

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