अनुप्रास अलंकार – परिभाषा, भेद, लक्षण, चिह्न एवं उदाहरण


इस आर्टिकल में हम अनुप्रास अलंकार – Anupras Alankar in Hindi पढेंगे, तो चलिए विस्तार से पढ़ते हैं अनुप्रास अलंकार परिभाषा, भेद, लक्षण, चिह्न एवं उदाहरण

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अनुप्रास अलंकार की परिभाषा

वर्णों की आवृत्ति को अनुप्रास कहते हैं अर्थात् ‘जहाँ समान वर्णों की बार-बार आवृत्ति होती है वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है।

OR

‘जब एक ही अक्षर वाक्य में एक से अधिक बार आये, तो वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है।

अनुप्रास अलंकार के लक्षण अथाव पहचान् चिह्न—

जहाँ व्यंजन वर्णों की आवृत्ति एक से अधिक बार होती है वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है।

अनुप्रास अलंकार का अर्थ—

अनुप्रास शब्द अनु तथा प्रास शब्दों के योग से बना है। अनु का अर्थ है— बार-बार तथा प्रास का अर्थ है— वर्ण। जहाँ स्वर की समानता के बिना भी वर्णों की बार-बार आवृत्ति होती है, वह अनुप्रास अलंकार होता है।

अनुप्रास अलंकार के उदाहरण—

क. भूरि-भूरि भेदभाव भूमि से गा दिया।

ख. रनि-नुजा माल रुवर बहु छाए।

ग. घुपति राघव राजा राम।

घ. बंदऊँ गुरु दुम रागा।

ङ. सुरुचि ुबास अनुरागा।। — (तुलसी)

स्पष्टीकरण— उपर्युक्त उदाहरणों के अन्तर्गत प्रथम में तथा द्वितीय में तथा तृतीय में व चतुर्थ में व पंचम में वर्ण की आवृत्ति के कारण अनुप्रास अलंकार है।

अनुप्रास अलंकार के भेद—

अनुप्रास अलंकार के मुख्य रुप में पाँच प्रकार हैं—

  1. छेकानुप्रास अलंकार
  2. वृत्यानुप्रास अलंकार
  3. लाटानुप्रास अलंकार
  4. श्रुत्यानुप्रास अलंकार
  5. अन्त्यानुप्रास अलंकार

छेकानुप्रास अलंकार की परिभाषा—

जब एक या अनेक वर्णों की आवृत्ति एक बार होती है, तब छेकानुप्रास अलंकार होता है।

छेकानुप्रास के लक्षण अथवा पहचान चिह्न—

एक या अनेक व्यंजनों की एक बार स्वरूपत: व क्रमत: आवृत्ति ही छेकानुप्रास अलंकार के लक्षण अथवा पहचान है।

छेकानुप्रास अलंकार के उदाहरण—

क. कहत कत परदेसी की बात।
ख. पीरी परी देह, छीनी राजत सनेह भीनी।

स्पष्टीकरण— उपर्युक्त उदाहरणों में प्रथम में वर्ण की तथा द्वितीय में वर्ण की आवृत्ति एक बार हुई है, अत: यहाँ छेकानुप्रास अलंकार है।

बंदऊ गुरु पद पदुम परागा।
सुरुचि सुबास सरस अनुरागा।।

स्पष्टीकरण— पद पदुम में पद एवं सुरुचि सुबास में सर एक ही स्वरुप के हैं। अत: यहाँ स्वरुप की आवृत्ति है। पद पदुम में के बाद तथा सुरुचि सरस में के बाद है। अत: यहाँ क्रम की आवृत्ति है इसलिए यह एक छेकानुप्रास अलंकार का उदाहरण है।

वृत्यानुप्रास अलंकार की परिभाषा—

जहां एक वर्ण की अनेक बार आवृत्ति हो, वहाँ वृत्यानुप्रास अलंकार होता है।

वृत्यानुप्रास अलंकार के लक्षण अथवा पहचान चिह्न—

अनेक व्यंजनों की अनेक बार स्वरुपत: व क्रमश: आवृत्ति ही वृत्यानुप्रास अलंकार की पहचान है।

वृत्यानुप्रास अलंकार के उदाहरण—

क. तरनि-तनुजा तट तमाल तरुवर बहु छाए।
ख. रघुपति राघव राजा राम।
ग. कारी कूर कोकिल कहाँ का बैर काढ़ति री।
घ. कलावती केलिवती कलिन्दजा।

स्पष्टीकरण— उपर्युक्त उदाहरणों में, प्रथम में वर्ण की, द्वितीय में वर्ण की, तृतीय में वर्ण की तथा चतुर्थ उदाहरण में की अनेक बार आवृत्ति हुई है। अत: यहाँ वृत्यनुप्रास अलंकार है।

श्रृत्यनुप्रास अलंकार की परिभाषा—

जब कण्ठ, तालु, दन्त आदि किसी एक ही स्थान से उच्चरित होनेवाले वर्णों की आवृत्ति होती है, तब वहाँ श्रृत्यनुप्रास अलंकार होता है।

श्रृत्यनुप्रास अलंकार के लक्षण अथवा पहचान—

कण्ठ, तालु दन्त आदि किसी एक ही स्थान से उच्चरित होने वाले वर्णों की आवृत्ति ही श्रृत्यनुप्रास अलंकार की पहचान है।

श्रृत्यनुप्रास अलंकार के उदाहरण—

तुलसीदास सीदत निसिदिन देखत तुम्हारि निठुराई ।

स्पष्टीकरण— उपर्युक्त उदाहरण में दन्त्य वर्णों त , द कण्ठ वर्ण तथा तालु वर्ण की आवृत्ति हुई है; अत: यहाँ श्रृत्यनुप्रास अलंकार है।

लाटानुप्रास अलंकार की परिभाषा—

जहाँ शब्द और अर्थ की आवृत्ति हो; अर्थात् जहाँ एकार्थक शब्दों की आवृत्ति हो, तो परन्तु अन्वय करने पर अर्थ भिन्न हो जाए; वहां लाटानुप्रास अलंकार होता है।

लाटानुप्रास अलंकार के लक्षण अथवा पहचान—

तात्पर्य मात्र के भेद से शब्द व अर्थ दोनों की पुनरुक्ति ही लाटानुप्रास अलंकार के लक्षण अथवा पहचान है।

लाटानुप्रास अलंकार के उदाहरण व स्पष्टीकरण—

लड़का तो लड़का ही है।(शब्द की पुनरुक्ति)

  • सामान्य लड़का
  • रुप बुद्धि शीलादि गुण सम्पन्न लड़का

पूत सपूत तो क्यों धन संचै ।
पूत कपूत तो क्यों धन संचै।।

अर्थ व स्पष्टीकरण— यह एक ही अर्थ वाले शब्द की आवृत्ति हो रही है, किन्तु अन्वय के कारण अर्थ बदल रहा है: जैसे– पुत्र यदि सपूत हो तो धन संचय की कोई आवश्यकता नहीं होती; क्योंकि वह स्वयं ही कमा लेगा और यदि पुत्र कपूत हो तो भी धन संचय की आवश्यकता नहीं होती; क्योंकि वह सारे धन को नष्ट कर देगा।

अन्त्यानुप्रास अलंकार की परिभाषा—

जब छन्द के शब्दों के अन्त में समान स्वर या व्यंजन की आवृत्ति हो, तो वहाँ अन्त्यानुप्रास अलंकार होता है।

अन्त्यानुप्रास अलंकार के लक्षण अथवा पहचान—

छन्द के शब्दों के अन्त में समान स्वर या व्यंजन की आवृत्ति ही अन्त्यानुप्रास अलंकार की पहचान है।

अन्त्यानुप्रास अलंकार के उदाहरण—

कहत नटत रीझत खिझत, मिलत खिलत लजियात।
भरे भौन में करतु हैं, नैननु ही सौं बात।।

स्पष्टीकरण— उपर्युक्त उदाहरण में, छन्द के अन्त में त व्यंजन की आवृत्ति हुई है, अत: यहाँ अन्त्यानुप्रास अलंकार है।


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